देश की पहली LNG ट्रेन और हाइड्रोजन ट्रेन दोनों ही रेलवे के लिए वैकल्पिक ईंधन तकनीक की दिशा में महत्वपूर्ण पहल हैं, लेकिन दोनों की कार्यप्रणाली अलग है। LNG ट्रेन में लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) का इस्तेमाल ईंधन के रूप में किया जाता है, जबकि हाइड्रोजन ट्रेन में हाइड्रोजन से ऊर्जा तैयार की जाती है। LNG तकनीक मौजूदा इंजन व्यवस्था के साथ ड्यूल-फ्यूल सिस्टम में इस्तेमाल हो सकती है, वहीं हाइड्रोजन ट्रेन फ्यूल-सेल तकनीक के जरिए बिजली पैदा कर सकती है। ऐसे में दोनों तकनीकों की पावर, उत्सर्जन, इंफ्रास्ट्रक्चर और संचालन की जरूरतों में अंतर देखने को मिलता है।
LNG ट्रेन को पारंपरिक डीजल इंजन के मुकाबले कम उत्सर्जन वाले विकल्प के तौर पर देखा जाता है। इसमें LNG को क्रायोजेनिक टैंक में बेहद कम तापमान पर संग्रहित किया जाता है और इंजन में ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। ड्यूल-फ्यूल तकनीक के कारण कुछ प्रणालियों में LNG के साथ डीजल का भी उपयोग किया जा सकता है।
वहीं, हाइड्रोजन ट्रेन की तकनीक अपेक्षाकृत अलग है। हाइड्रोजन फ्यूल सेल में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रतिक्रिया से बिजली उत्पन्न होती है, जिससे ट्रेन की इलेक्ट्रिक मोटर चलती है। इस प्रक्रिया में ट्रेन के स्तर पर मुख्य उत्सर्जन पानी और जलवाष्प होता है, हालांकि हाइड्रोजन के उत्पादन का पर्यावरणीय प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उसे किस तरीके से बनाया गया है।
पावर की बात करें तो ट्रेन की वास्तविक क्षमता केवल ईंधन के नाम से तय नहीं होती। इंजन या फ्यूल-सेल की क्षमता, मोटर, ट्रेन का वजन, रूट और संचालन की जरूरतें भी प्रदर्शन को प्रभावित करती हैं। इसलिए LNG और हाइड्रोजन ट्रेनों की तुलना करते समय केवल हॉर्सपावर के बजाय पूरी ऊर्जा प्रणाली को देखना जरूरी है।
रेलवे के लिए LNG तकनीक मौजूदा डीजल आधारित ढांचे में संक्रमण के एक विकल्प के रूप में देखी जा सकती है, जबकि हाइड्रोजन तकनीक लंबी अवधि में कम-कार्बन रेल परिवहन की दिशा में एक अलग रास्ता प्रस्तुत करती है। दोनों तकनीकों के बीच लागत, ईंधन उपलब्धता, भंडारण, सुरक्षा और रिफ्यूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर भी महत्वपूर्ण अंतर पैदा करते हैं।



