बच्चों के अकाउंट पर टेक कंपनियों की सख्ती, AI से उम्र जांच बनी चुनौती

बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाने के लिए टेक कंपनियां उम्र की जांच को पहले से ज्यादा सख्त बनाने में जुटी हैं। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर नाबालिगों के अकाउंट की पहचान अब सुरक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा बन गई है।
कई प्लेटफॉर्म अब केवल यूजर की ओर से बताई गई जन्मतिथि पर निर्भर नहीं रहना चाहते। इसके बजाय AI की मदद से प्रोफाइल, पोस्ट, कमेंट, बायो और अन्य गतिविधियों से यह अनुमान लगाने की कोशिश की जा रही है कि अकाउंट किसी बच्चे या किशोर का है या नहीं।
Meta ने अपने प्लेटफॉर्म्स पर AI आधारित age assurance तकनीक को मजबूत किया है। कंपनी का सिस्टम प्रोफाइल में मौजूद संदर्भों के साथ फोटो और वीडियो के सामान्य विजुअल संकेतों का विश्लेषण कर उम्र का अनुमान लगा सकता है। कंपनी के अनुसार यह तकनीक किसी व्यक्ति की पहचान करने के बजाय उसकी संभावित उम्र का अनुमान लगाने पर केंद्रित है।
इसके बावजूद बच्चों के अकाउंट की सटीक पहचान आसान नहीं है। कोई नाबालिग गलत जन्मतिथि डालकर अकाउंट बना सकता है या किसी दूसरे व्यक्ति की जानकारी का इस्तेमाल कर सकता है। दूसरी तरफ AI द्वारा उम्र का अनुमान गलत होने पर वयस्क यूजर को भी गलती से नाबालिग माना जा सकता है।
उम्र की जांच को लेकर सबसे बड़ी चिंता प्राइवेसी की भी है। यदि प्लेटफॉर्म्स उम्र पता करने के लिए पहचान संबंधी जानकारी, फोटो या अन्य व्यक्तिगत डेटा का इस्तेमाल करते हैं, तो इस डेटा की सुरक्षा महत्वपूर्ण हो जाती है। विशेषज्ञ और डिजिटल अधिकार संगठन अनिवार्य age verification के संभावित निजता प्रभावों पर सवाल उठा रहे हैं।
दुनिया के कई देशों में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए नए नियम बनाए जा रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका समेत कई जगहों पर प्लेटफॉर्म्स से नाबालिगों की सुरक्षा के लिए उम्र जांच और अन्य सुरक्षा उपाय मजबूत करने की मांग बढ़ी है।
अमेरिका में Meta के हालिया समझौते के बाद Facebook और Instagram पर बच्चों और किशोरों की सुरक्षा के लिए उम्र पहचान से जुड़े उपायों को और मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। कंपनी को नाबालिग यूजर्स की पहचान और सुरक्षा व्यवस्था पर स्वतंत्र निगरानी का भी सामना करना होगा।
टेक कंपनियों के सामने चुनौती यह है कि बच्चों को हानिकारक कंटेंट और ऑनलाइन जोखिमों से बचाते हुए वयस्क यूजर्स की निजता भी सुरक्षित रखी जाए। आने वाले समय में AI आधारित age verification का इस्तेमाल बढ़ सकता है, लेकिन इसकी सटीकता, पारदर्शिता और डेटा सुरक्षा पर लगातार सवाल बने रहेंगे।
बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के लिए केवल तकनीक पर्याप्त नहीं होगी। प्लेटफॉर्म्स, सरकारों, अभिभावकों और स्कूलों को मिलकर काम करना होगा, ताकि नाबालिगों की पहचान के साथ-साथ उन्हें सुरक्षित डिजिटल वातावरण भी उपलब्ध कराया जा सके।



