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प्रथम छह माह: जीवन की आधारशिला’ – पोषण पाठशाला से स्टंटिंग उन्मूलन की ओर सार्थक पहल

शिशु जीवन के पहले छह महीने को वैज्ञानिक और चिकित्सकीय दृष्टिकोण से “जीवन की आधारशिला” माना जाता है। इसी अवधारणा को केंद्र में रखकर भारत सरकार और विभिन्न संस्थानों द्वारा ‘पोषण पाठशाला’ कार्यक्रम के माध्यम से स्टंटिंग (अविकसित वृद्धि) को समाप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और सराहनीय कदम उठाया गया है।

पोषण पाठशाला एक ऐसा मंच है, जिसके माध्यम से गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं, किशोरियों और अभिभावकों को शिशु और मातृ पोषण से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी दी जाती है। इसका उद्देश्य है कि समाज के हर वर्ग में यह जागरूकता फैले कि बच्चे के पहले छह महीने तक उसे केवल माँ का दूध (अनन्य स्तनपान) ही देना चाहिए और कोई भी बाहरी आहार नहीं देना चाहिए।

स्टंटिंग, यानी बच्चों की उम्र के अनुसार उनकी लंबाई का कम होना, भारत में एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या रही है। यूनिसेफ और NFHS (नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे) की रिपोर्टों के अनुसार, भारत में लगभग 30% से अधिक बच्चे स्टंटिंग का शिकार हैं। इसका मुख्य कारण है – अपर्याप्त पोषण, अशिक्षा, भ्रांतियां, और प्रसव पूर्व देखभाल की कमी।

पोषण पाठशाला के माध्यम से इस चुनौती से निपटने की दिशा में जो प्रयास किए जा रहे हैं, वे जमीनी स्तर पर व्यवहार में परिवर्तन लाने की कोशिश कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता प्रशिक्षण के जरिए माताओं को पोषण का महत्व, स्तनपान के फायदे, शुद्ध पेयजल का उपयोग और पूरक आहार की सही समय पर शुरुआत जैसे विषयों पर शिक्षित कर रही हैं।

कार्यक्रम का विशेष फोकस उन भ्रांतियों को तोड़ने पर है, जो सदियों से समाज में मौजूद हैं, जैसे –

  • जन्म के तुरंत बाद बच्चे को शहद देना चाहिए।

  • मां का पहला दूध बच्चे के लिए हानिकारक होता है।

  • 2-3 महीने के भीतर ही बाहर का दूध या पानी देना शुरू कर देना चाहिए।

इन सभी गलत धारणाओं को वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ चुनौती दी जा रही है और माताओं को यह बताया जा रहा है कि केवल मां का दूध ही शिशु की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है, उसका संपूर्ण पोषण करता है, और जीवनभर के लिए एक स्वस्थ नींव रखता है।

पोषण पाठशाला का एक और महत्वपूर्ण पहलू है सामुदायिक भागीदारी। स्कूल, पंचायतें, महिला समूह, और स्वयंसेवी संस्थाओं को साथ जोड़कर यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि हर घर तक सही पोषण की बात पहुंचे।

निष्कर्ष:

‘प्रथम छह माह जीवन की आधारशिला’ केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि स्वस्थ भारत की नींव रखने का संकल्प है। पोषण पाठशाला जैसी पहलें यदि निरंतर और व्यापक रूप से लागू की जाएं, तो न सिर्फ स्टंटिंग को जड़ से मिटाया जा सकता है, बल्कि भारत को एक कुपोषण-मुक्त राष्ट्रबनाने का सपना भी साकार हो सकता है।

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