यूपी में 10,827 स्कूलों का मर्जर: 6 साल में बंद हुए 36 हजार स्कूल, विपक्ष का सरकार पर हमला तेज

उत्तर प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। राज्य सरकार द्वारा 10,827 सरकारी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों के मर्जर (विलय) की घोषणा के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई है। आंकड़ों के मुताबिक, पिछले छह वर्षों में करीब 36,000 स्कूलों की संख्या घट चुकी है, जिससे शिक्षा के अधिकार, ग्रामीण शिक्षा और सरकारी स्कूलों के भविष्य को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
शासन स्तर पर इस निर्णय को “स्कूलों की गुणवत्ता और संसाधनों के बेहतर उपयोग” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। सरकार का कहना है कि जिन स्कूलों में छात्र संख्या अत्यधिक कम है या जो एक-दूसरे के बहुत करीब स्थित हैं, उन्हें एकीकृत कर दिया जा रहा है ताकि शिक्षकों की नियुक्ति, संसाधनों का वितरण और शैक्षणिक वातावरण बेहतर किया जा सके।
हालांकि, विपक्ष ने इस कदम को शिक्षा विरोधी करार देते हुए विधानसभा में सरकार को घेरने की तैयारी शुरू कर दी है। सपा, कांग्रेस और बसपा जैसे दलों का कहना है कि स्कूल बंद करने या मर्ज करने से ग्रामीण और गरीब तबकों के बच्चों की शिक्षा पर बुरा असर पड़ेगा, क्योंकि इससे स्कूल तक पहुंचना कठिन हो जाएगा और ड्रॉपआउट दर बढ़ेगी।
समाजवादी पार्टी के नेताओं ने आरोप लगाया है कि सरकार शिक्षा को लेकर गंभीर नहीं है। उनका कहना है कि स्कूलों की संख्या कम करना यह दिखाता है कि सरकार सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था से पीछे हट रही है और शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा दे रही है।
शिक्षाविदों का भी मानना है कि स्कूलों के मर्जर में सावधानी बरतनी जरूरी है। जहां एक ओर बेहतर शिक्षा देने का उद्देश्य हो सकता है, वहीं अगर विद्यार्थियों को लंबी दूरी तय कर स्कूल जाना पड़े या शिक्षक अनुपस्थित रहें, तो यह नीति असफल हो सकती है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, कई ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे भी स्कूल मर्ज किए जा रहे हैं, जहां पहले से ही संसाधनों की कमी है – न शौचालय हैं, न पीने का पानी, और न ही पर्याप्त शिक्षक। ऐसे में इन स्कूलों का विलय, शिक्षा के स्तर को और नीचे खींच सकता है।
सरकार की ओर से यह भी दावा किया जा रहा है कि मर्जर के बाद सभी एकीकृत स्कूलों को स्मार्ट क्लास, डिजिटल लर्निंग, और लाइब्रेरी जैसी सुविधाओं से लैस किया जाएगा, जिससे बच्चों को बेहतर शैक्षणिक माहौल मिलेगा।
निष्कर्ष:
उत्तर प्रदेश में स्कूलों का मर्जर एक नीतिगत बदलाव है, लेकिन इसका असर व्यापक और गहराई से महसूस किया जाएगा। एक ओर यह कदम संसाधनों के केंद्रीकरण और गुणवत्ता सुधार की दिशा में उठाया गया प्रतीत होता है, वहीं दूसरी ओर इससे गरीब, ग्रामीण और पिछड़े वर्गों के बच्चों की शिक्षा बाधित होने का खतरा भी बढ़ गया है।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आगामी विधानसभा सत्र में विपक्ष इस मुद्दे को किस हद तक उछालता है और सरकार इसके जवाब में क्या ठोस नीति और समाधान प्रस्तुत करती है।



