
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति और रिपब्लिकन नेता डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी राजनीतिक रणनीति के तहत एक बार फिर टैरिफ को हथियार बनाने का संकेत दिया है। उनका मानना है कि आयातित सामानों पर भारी शुल्क लगाने से अमेरिकी उद्योगों को मजबूती मिलेगी और “मेड इन अमेरिका” की नीति को बल मिलेगा। लेकिन आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह दांव ट्रंप पर ही उल्टा पड़ सकता है। अगर वैश्विक स्तर पर टैरिफ नीति लागू की जाती है, तो इसका सीधा असर अमेरिकी उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा और लगभग 10 लाख लोग गरीबी रेखा के नीचे जा सकते हैं।
दरअसल, अमेरिका की अर्थव्यवस्था बड़ी हद तक आयातित वस्तुओं पर निर्भर है। रोज़मर्रा की ज़रूरतों से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सामान और कच्चे माल तक का बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से आता है। ऐसे में ट्रंप द्वारा प्रस्तावित टैरिफ बढ़ोतरी से इन वस्तुओं की कीमतें दोगुनी-तिगुनी तक हो सकती हैं। महंगाई का सीधा बोझ आम अमेरिकी परिवारों पर पड़ेगा। इसका सबसे बड़ा असर लोअर और मिडिल क्लास पर होगा, जो पहले से ही बढ़ती महंगाई और घटती आय से परेशान हैं।
आर्थिक विश्लेषकों के मुताबिक, टैरिफ बढ़ने से अमेरिकी कंपनियों को भी नुकसान होगा। उत्पादन लागत बढ़ने से उनकी प्रतिस्पर्धा क्षमता घटेगी और कई उद्योगों में रोजगार के अवसर कम हो जाएंगे। निर्यात पर भी विपरीत असर पड़ सकता है, क्योंकि दूसरे देश जवाबी कार्रवाई के तौर पर अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ लगा सकते हैं। नतीजतन, अमेरिका का निर्यात घटेगा और व्यापार घाटा और बढ़ सकता है।
यह स्थिति न केवल अर्थव्यवस्था को झटका देगी बल्कि सामाजिक असमानता को भी बढ़ाएगी। पहले से ही अमेरिका में लाखों लोग स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास की बढ़ती लागत से जूझ रहे हैं। ऐसे में टैरिफ का असर सीधे तौर पर उनकी बुनियादी ज़रूरतों पर पड़ेगा। कई अध्ययन बताते हैं कि अगर यह नीति लागू होती है तो लगभग 10 लाख लोग गरीबी रेखा के नीचे पहुंच सकते हैं और मध्यम वर्ग की बड़ी आबादी आर्थिक असुरक्षा की स्थिति में आ जाएगी।
राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो ट्रंप की यह नीति उन्हें कुछ हद तक राष्ट्रवादी मतदाताओं का समर्थन दिला सकती है। “अमेरिका फर्स्ट” का नारा उनके समर्थकों के बीच लोकप्रिय है। लेकिन वास्तविकता यह है कि यह कदम अमेरिकी उपभोक्ताओं और मजदूरों के लिए आर्थिक संकट का कारण बनेगा।
कुल मिलाकर, ट्रंप का टैरिफ दांव उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को भले ही आगे बढ़ाए, लेकिन अमेरिकी अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों के लिए यह घातक साबित हो सकता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अमेरिकी जनता इस नीति को समर्थन देगी या फिर बढ़ती महंगाई और गरीबी की वजह से इसके खिलाफ खड़ी होगी।



