
मध्य पूर्व में एक बार फिर तनाव चरम पर पहुंच गया है। इजराइल ने बीते 72 घंटों में एक साथ छह मुस्लिम देशों पर बड़े पैमाने पर हवाई और मिसाइल हमले किए। इन हमलों में अब तक 200 लोगों की मौत और 1000 से ज्यादा घायल होने की खबर सामने आई है। इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अपने बयान में साफ कहा है कि “हम वही कर रहे हैं जो अमेरिका ने अपने दुश्मनों के खिलाफ किया था। अगर हमारे अस्तित्व को चुनौती दी जाएगी, तो हम किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।”
हमला क्यों हुआ?
सूत्रों के मुताबिक, इजराइल को लगातार कई मुस्लिम देशों से हमलों और साजिशों की खुफिया जानकारी मिल रही थी। इजराइली इंटेलिजेंस एजेंसियों ने यह दावा किया कि कई आतंकवादी संगठन पड़ोसी देशों की जमीन से इजराइल पर हमले की तैयारी कर रहे थे। इसी कारण इजराइल ने प्री-एंप्टिव स्ट्राइक (पहले हमला करके खतरे को खत्म करने की रणनीति) अपनाई।
किन देशों पर हुआ हमला?
हालांकि आधिकारिक रूप से इजराइल ने देशों के नाम स्पष्ट नहीं किए हैं, लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि हमलों का निशाना सीरिया, लेबनान, इराक, ईरान, यमन और गाज़ा पट्टी बने। इन जगहों पर इजराइली वायुसेना ने मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जिनसे भारी नुकसान हुआ।
अमेरिका की तरह क्यों?
नेतन्याहू का यह बयान चर्चा में है कि “हम वही कर रहे हैं जो अमेरिका ने किया था।” उनका इशारा अमेरिका की उस रणनीति की ओर था, जिसमें अमेरिका ने 9/11 हमलों के बाद अफगानिस्तान और इराक में आतंकियों और उनके ठिकानों को खत्म करने के लिए बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान चलाए थे। इजराइल का कहना है कि यदि दुश्मन हमला करने से पहले ही नष्ट कर दिया जाए, तो देश को बड़ी तबाही से बचाया जा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
इस घटना पर संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ और अरब लीग ने गहरी चिंता जताई है। कई मुस्लिम देशों ने इजराइल की कार्रवाई को “आक्रामक और अमानवीय” करार दिया है। वहीं, अमेरिका ने फिलहाल चुप्पी साध रखी है, लेकिन माना जा रहा है कि वह इजराइल की इस कार्रवाई का अप्रत्यक्ष समर्थन कर सकता है।
क्षेत्रीय अस्थिरता का खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि यह हमला केवल शुरुआत हो सकता है। अगर मुस्लिम देश मिलकर इजराइल के खिलाफ जवाबी कार्रवाई करते हैं, तो यह संघर्ष पूरे मध्य पूर्व को युद्ध की आग में झोंक सकता है। इससे न केवल क्षेत्रीय स्थिरता खतरे में पड़ेगी, बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति और आर्थिक व्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ेगा।
निष्कर्ष
इजराइल का यह साहसिक और विवादित कदम आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा बदल सकता है। नेतन्याहू के बयान से साफ है कि इजराइल अब पूरी तरह अमेरिकी नीति की राह पर चल पड़ा है। हालांकि, इसका नतीजा कितना विनाशकारी होगा, यह आने वाला समय ही बताएगा।



