
फंड की कमी और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने हाल ही में अपना नाम बदल लिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि संगठन यह कदम इसलिए उठा रहा है ताकि वैश्विक स्तर पर उसकी पहचान कमजोर पड़ जाए और वह अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की नजरों से खुद को बचा सके। ग्लोबल वित्तीय निगरानी संस्था FATF (फ़ाइनेंसियल एक्शन टास्क फोर्स) ने इस पैंतरे का भंडाफोड़ कर दिया है और साफ कर दिया है कि नाम बदल लेने से आतंकी संगठन की असली गतिविधियों पर कोई पर्दा नहीं डाला जा सकता।
जैश-ए-मोहम्मद लंबे समय से भारत समेत कई देशों में हमलों को अंजाम देने के लिए बदनाम रहा है। 2001 का भारतीय संसद हमला हो या 2016 का पठानकोट आतंकी हमला, इस संगठन ने कई बार खून-खराबे और दहशत का खेल खेला है। परंतु अब अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और आतंक फंडिंग पर नकेल कसने की कोशिशों के कारण संगठन को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। FATF ने पाकिस्तान को पहले भी कई बार चेतावनी दी है कि अगर उसने अपने यहां मौजूद आतंकी संगठनों पर सख्ती नहीं दिखाई तो उसे ब्लैकलिस्ट किया जा सकता है।
विश्लेषकों का कहना है कि फंड की कमी जैश-ए-मोहम्मद की सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है। खाड़ी देशों से आने वाली संदिग्ध फंडिंग पर अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने न केवल निगरानी बढ़ाई है बल्कि कई चैनलों को बंद भी कर दिया है। ऐसे में संगठन ने अपनी गतिविधियों को जारी रखने के लिए नाम बदलने का रास्ता चुना है। आतंकी संगठन अक्सर इस तरह के हथकंडे अपनाते रहे हैं ताकि वे प्रतिबंधित सूची से बच सकें और नए नाम के सहारे अपने नेटवर्क को सक्रिय रख सकें।
FATF की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि केवल नाम बदल लेने से किसी संगठन का चरित्र नहीं बदल जाता। जैश चाहे जिस भी नाम से काम करें, उसकी गतिविधियां आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली ही हैं। रिपोर्ट में पाकिस्तान की सरकार पर भी सवाल उठाए गए हैं कि वह क्यों इन संगठनों पर निर्णायक कार्रवाई करने में असफल रही है। आलोचकों का कहना है कि इस्लामाबाद कई बार सिर्फ अंतरराष्ट्रीय दबाव कम करने के लिए नकली कदम उठाता है, जबकि जमीन पर आतंकी ढांचों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती।
भारत लगातार दुनिया के सामने यह मुद्दा उठाता रहा है कि पाकिस्तान अपनी जमीन पर पल रहे आतंकी संगठनों पर लगाम लगाने में नाकाम रहा है। कई बार भारत ने यह भी कहा है कि जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठन नाम बदलकर भी अपने नेटवर्क को जारी रखते हैं और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों से उन्हें मौन समर्थन मिलता है। FATF के हालिया खुलासे ने भारत की इन दलीलों को मजबूती दी है।
दरअसल, नाम बदलने की कोशिश यह साफ संकेत है कि आतंकी संगठन अब आर्थिक संकट और वैश्विक एक्शन से डरे हुए हैं। उन्हें यह एहसास हो गया है कि लंबे समय तक वे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आंखों में धूल नहीं झोंक सकते। अगर पाकिस्तान समय रहते इन संगठनों पर निर्णायक कार्रवाई नहीं करता, तो FATF उसे एक बार फिर ग्रे लिस्ट या ब्लैक लिस्ट में डाल सकता है, जिसका उसकी अर्थव्यवस्था पर भारी असर पड़ेगा।
आतंकवाद के खिलाफ जंग केवल बयानों से नहीं जीती जा सकती। इसके लिए पाकिस्तान को वास्तविक इरादे से कदम उठाने होंगे। जैश-ए-मोहम्मद का नाम बदलना चाहे एक नया पैंतरा हो, लेकिन अब दुनिया सतर्क है और इस बार आतंकवाद के खिलाफ मिलकर कार्रवाई करने की तैयारी भी दिखा रही है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में पाकिस्तान और उसका पाले हुए संगठन किस रास्ते पर आगे बढ़ते हैं।



