
अमेरिका की पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) ने हाल ही में यह बड़ा खुलासा करते हुए कहा कि ट्रम्प प्रशासन के दौरान लिए गए कई गलत फैसलों के कारण भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों में दूरी आई। उनके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में संतुलन और स्थिरता बेहद जरूरी होती है, लेकिन पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कई बार ऐसे निर्णय लिए जो दोनों लोकतांत्रिक देशों के आपसी भरोसे पर असर डालते रहे। इसका सीधा नुकसान अमेरिका को झेलना पड़ा क्योंकि भारत उसके सबसे करीबी रणनीतिक साझेदारों में से एक है।
भारत और अमेरिका के बीच संबंध दशकों से गहराते रहे हैं, खासकर आर्थिक सहयोग, रक्षा समझौतों और वैश्विक मुद्दों पर साझा रणनीति के कारण। लेकिन ट्रम्प की नीतियों ने इस प्रगति की गति को धीमा कर दिया। उदाहरण के तौर पर, वाणिज्यिक टकराव और आयात-निर्यात पर कड़े कर लगाना ट्रम्प सरकार का ऐसा कदम था जिससे भारत को झटका लगा। इससे द्विपक्षीय व्यापार में तनाव पैदा हुआ और दोनों देशों की कंपनियों में असहजता बढ़ी। अमेरिका जहां घरेलू उद्योग को बढ़ावा देने के नाम पर संरक्षणवादी नीति की ओर बढ़ रहा था, वहीं भारत को इस नीति से अलग-थलग महसूस हुआ।
पूर्व NSA ने कहा कि ट्रम्प प्रशासन ने अक्सर एकतरफा तरीके से फैसले लिए, जबकि भारत जैसे साझेदार देशों के साथ संवाद और विश्वास का रिश्ता बनाए रखना चाहिए था। खासतौर पर अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की जल्द वापसी का फैसला भारत के लिए रणनीतिक झटका था। भारत हमेशा इस क्षेत्र में स्थिरता चाहता रहा है और आतंकवाद पर सख्त रुख अपनाता रहा है, लेकिन अचानक अमेरिकी रणनीति बदलने से भारत को अपनी नीतियों पर दोबारा विचार करना पड़ा।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत और अमेरिका के रिश्तों की असली ताकत लोकतंत्र, समान विचारधारा और आर्थिक अवसरों पर आधारित है। लेकिन जब भी कूटनीतिक स्तर पर गलत फैसले लिए जाते हैं, तो इसका असर लंबे समय तक रहता है। पूर्व NSA का यह बयान भी इसी तथ्य को रेखांकित करता है कि ट्रम्प के दौर में भारत को दूरी बनानी पड़ी, और इस दूरी का फायदा चीन और रूस जैसे देशों ने उठाने की कोशिश की। यह अमेरिका की कूटनीतिक स्थिति के लिए नुकसानदेह साबित हुआ।
भारत ने हमेशा ज्यादा संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है। ट्रम्प सरकार के दौरान वह अमेरिका से दूर होते हुए रूस और यूरोप के साथ रिश्तों को संतुलित करने लगा। रक्षा क्षेत्र में भी भारत ने अपने विकल्पों को बढ़ाया और बहुस्तरीय साझेदारी पर ध्यान दिया। हालांकि, भारत यह मानता है कि अमेरिका उसकी वैश्विक रणनीति में एक अहम पार्टनर है, लेकिन ट्रम्प के कार्यकाल ने इस भरोसे को कुछ हद तक हिलाकर रख दिया।
पूर्व NSA का यह बयान अमेरिकी राजनीतिक हलकों में भी बहस का कारण बना है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह चर्चा केवल ट्रम्प की नीतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठाती है कि क्या अमेरिका अपने सहयोगी देशों के साथ लंबे समय तक स्थिर भरोसेमंद संबंध कायम रख सकता है या नहीं। ऐसे वक्त में जब वैश्विक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है, और चीन जैसे देश लगातार चुनौती दे रहे हैं, भारत जैसे मित्रों को खोना अमेरिका के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
भारत और अमेरिका दोनों ही लोकतंत्रीय मूल्य और स्वतंत्रता के हिमायती हैं। यदि दोनों के बीच रिश्तों में मजबूती आती है तो यह एशिया से लेकर वैश्विक राजनीति तक पर असर डालता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य की अमेरिकी सरकारों को भारत के साथ संबंध और भी संवेदनशीलता और परिपक्वता के साथ संभालने होंगे। पूर्व NSA का यह बयान एक चेतावनी है कि इतिहास में ली गई गलतियां दोहराई नहीं जानी चाहिए।



