
बिहार में नई सरकार बनाने की कवायद तेजी पकड़ चुकी है और सत्ता की तस्वीर अब स्पष्ट होती जा रही है। चुनाव परिणामों के बाद राजनीतिक दलों ने रणनीति बनानी शुरू कर दी है और गठबंधन के नेताओं के बीच बैठकों का दौर लगातार जारी है। सूत्रों के अनुसार, सरकार बनाने का खाका लगभग तैयार हो चुका है और अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी किसके पास जाएगी और कैबिनेट में किस दल का कितना दबदबा रहेगा।
जानकारों का कहना है कि सरकार गठन के फॉर्मूले में राष्ट्रीय राजनीति और क्षेत्रीय समीकरण, दोनों को संतुलित किया जा रहा है। मुख्यमंत्री पद को लेकर जो चर्चा पहले से चली आ रही थी, वह अभी भी वही है—सबसे बड़े दल या गठबंधन का चेहरा ही CM बनेगा। हालांकि फॉर्मूले में यह भी तय किया गया है कि गठबंधन के सहयोगियों को सत्ता में उचित भागीदारी दी जाएगी, ताकि पूरे पांच साल सरकार स्थिर रह सके।
सूत्रों के मुताबिक, CM पद के लिए दो संभावित नामों पर गंभीर मंथन चल रहा है। इनमें एक अनुभवी नेता शामिल हैं, जिनकी पकड़ जमीनी स्तर तक मजबूत है, जबकि दूसरे युवा चेहरा हैं, जिन्हें विकास और प्रशासनिक छवि के आधार पर बढ़त मिल सकती है। अंतिम निर्णय शीर्ष नेतृत्व की सहमति से ही होगा।
कैबिनेट गठन की बात करें तो इसमें हर दल की शक्ति के अनुपात में मंत्री पद देने पर सहमति बनी है। बड़ा दल महत्वपूर्ण मंत्रालयों—गृह, वित्त, सड़क निर्माण, ग्रामीण विकास—पर अपनी पकड़ बनाए रखेगा। वहीं छोटे सहयोगी दलों को भी शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग जैसे अहम विभाग दिए जा सकते हैं, ताकि सत्ता संचालन में सभी की भूमिका सुनिश्चित हो सके।
इसके अलावा, क्षेत्रीय संतुलन भी इस बार कैबिनेट गठन में अहम भूमिका निभाएगा। मिथिलांचल, मगध, सीमांचल और भोजपुर जैसे क्षेत्रों से भी प्रतिनिधियों को कैबिनेट में शामिल करने की तैयारी है, ताकि हर इलाके को राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल सके। जातीय समीकरण भी इस पूरी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण भाग है, क्योंकि बिहार की राजनीति इन आधारों पर काफी हद तक प्रभावित होती है।
कुल मिलाकर, बिहार में सरकार गठन का फॉर्मूला इस तरह तैयार किया जा रहा है कि किसी भी दल या नेता को असंतोष का मौका न मिले। मुख्यमंत्री पद और कैबिनेट में हिस्सेदारी को लेकर अंतिम घोषणा जल्द होने की उम्मीद है, और तब यह साफ हो जाएगा कि नई सरकार का असली नेतृत्व किसके हाथ में होगा।



