
यदि किसी राजनीतिक दल के बड़ी संख्या में विधायक पार्टी छोड़ दें, तो क्या वे मूल पार्टी पर दावा कर सकते हैं? यह सवाल अक्सर राजनीतिक उठापटक के दौरान सामने आता है। Mamata Banerjee और All India Trinamool Congress के संदर्भ में भी यही चर्चा होती रही है कि यदि बड़ी संख्या में विधायक अलग हो जाएं, तो क्या पार्टी उनके हाथ में चली जाएगी।
भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule), जिसे आमतौर पर दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) कहा जाता है, के तहत यदि कोई विधायक स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ता है या पार्टी व्हिप के खिलाफ मतदान करता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है। 2003 में हुए संवैधानिक संशोधन के बाद “एक-तिहाई विधायकों के टूटकर अलग होने” वाली छूट खत्म कर दी गई थी।
वर्तमान कानून के अनुसार, यदि किसी दल के कम से कम दो-तिहाई विधायक किसी दूसरे दल में विलय (Merger) का निर्णय लेते हैं, तभी उन्हें दलबदल कानून से राहत मिल सकती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे मूल राजनीतिक पार्टी के संगठन, चुनाव चिह्न या नाम पर स्वतः अधिकार प्राप्त कर लेंगे। पार्टी पर दावा और चुनाव चिह्न से जुड़े विवादों का फैसला अलग कानूनी और निर्वाचन प्रक्रिया के तहत होता है।
इसलिए केवल 58 विधायक टूट जाने भर से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि TMC ममता बनर्जी के हाथ से निकल जाएगी। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कुल विधायकों की संख्या क्या है, कितने विधायक अलग हुए हैं, वे किस कानूनी प्रक्रिया का पालन कर रहे हैं और संबंधित संवैधानिक व निर्वाचन प्रावधान क्या कहते हैं। राजनीतिक रूप से यह बड़ा झटका हो सकता है, लेकिन कानूनी रूप से पार्टी के अस्तित्व, नेतृत्व और चुनाव चिह्न पर अधिकार का प्रश्न कहीं अधिक जटिल प्रक्रिया से तय होता है।



