
मानसून की पहली तेज बारिश के साथ ही भारत के कई बड़े शहरों में जलभराव की समस्या दिखाई देने लगती है। सड़कें तालाब जैसी नजर आने लगती हैं और आम लोगों को ट्रैफिक, बिजली और आवागमन जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसके पीछे अनियोजित शहरीकरण, कम होते प्राकृतिक जल स्रोत और कमजोर ड्रेनेज सिस्टम जैसे कारण बताए जाते हैं।
चीन और नीदरलैंड जैसे देशों ने बारिश के पानी को समस्या के बजाय संसाधन की तरह इस्तेमाल करने के लिए नई तकनीकों पर काम किया है। इनमें स्पंज सिटी मॉडल प्रमुख है, जिसमें शहरों को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि वे बारिश के पानी को सोख सकें, रोक सकें और जरूरत के समय उसका उपयोग कर सकें।
इस मॉडल में हरे क्षेत्र, वर्षा जल संचयन, पारगम्य सड़कें, कृत्रिम तालाब और बेहतर जल प्रबंधन प्रणाली शामिल होती हैं। इसका उद्देश्य बारिश के पानी को तुरंत नालियों में बहाने के बजाय जमीन में पहुंचाना और बाढ़ के खतरे को कम करना होता है।
भारत में भी कई शहरों के लिए ऐसे उपायों की जरूरत महसूस की जा रही है। बढ़ती आबादी, कंक्रीट से ढकती जमीन और बदलते मौसम के कारण पारंपरिक जल निकासी व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है।
शहरी नियोजन में प्रकृति आधारित समाधानों को शामिल करके जलभराव की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। स्पंज सिटी मॉडल भारत के लिए एक ऐसा विकल्प हो सकता है, जो विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने में मदद करे।



