Dhanteras 2026: धनतेरस पर पुराने सिक्के और नए दीपक का महत्व

हिंदू धर्म में धनतेरस का पर्व दीपावली से पहले मनाया जाता है। इसे धनत्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाए जाने वाले इस त्योहार का संबंध धन, स्वास्थ्य और समृद्धि से है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसलिए इस दिन उनकी पूजा करने की परंपरा है। साल 2026 में धनतेरस 6 नवंबर, शुक्रवार को मनाई जाएगी।
धनतेरस पर पुराने सिक्कों की पूजा क्यों होती है?
धनतेरस पर पुराने सिक्कों और घर में रखे धन की पूजा करने की परंपरा को मां लक्ष्मी के स्वागत और आर्थिक समृद्धि की कामना से जोड़कर देखा जाता है। कई परिवारों में पुराने सिक्कों को साफ करके पूजा स्थल पर रखा जाता है। उन पर रोली और अक्षत लगाकर मां लक्ष्मी तथा भगवान कुबेर से घर में सुख-समृद्धि बनाए रखने की प्रार्थना की जाती है। कुछ लोग नए खरीदे गए सोने-चांदी के सिक्कों को भी पूजा में शामिल करते हैं। मान्यता है कि धन की पूजा करने से घर में बरकत बनी रहती है।
नए मिट्टी के दीपक खरीदने का क्या है महत्व?
धनतेरस पर नए मिट्टी के दीपक खरीदना भी शुभ परंपराओं में शामिल है। मिट्टी के दीपक को पवित्रता, प्रकाश और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। इस दिन घर के मुख्य द्वार, आंगन और पूजा स्थल पर दीपक जलाए जाते हैं। मान्यता है कि दीपों की रोशनी से घर में सुख-शांति और समृद्धि का आगमन होता है। मिट्टी से बने दीपक भारतीय संस्कृति में प्रकृति और परंपरा से जुड़ाव का भी प्रतीक हैं।
धनतेरस पर यमराज के नाम से क्यों जलाया जाता है दीपक?
धनतेरस पर यमराज के नाम से दीपदान करने की परंपरा को यम दीपदान कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन शाम के समय घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीपक जलाया जाता है। दक्षिण दिशा को यमराज की दिशा माना गया है। इस दीपदान के माध्यम से परिवार के सदस्य यमराज से अपने परिजनों की लंबी उम्र और कल्याण की प्रार्थना करते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है।
क्या है यम दीपदान से जुड़ी पौराणिक कथा?
यम दीपदान से जुड़ी एक प्रचलित पौराणिक कथा राजा हेम के पुत्र की है। कथा के अनुसार, राजकुमार की कुंडली में विवाह के कुछ दिनों बाद मृत्यु का योग बताया गया था। जब उनकी पत्नी को इस बात का पता चला तो उसने अपने पति के प्राण बचाने के लिए रातभर दीपक जलाए और घर के द्वार पर सोने-चांदी के आभूषण तथा अन्य चमकदार वस्तुएं रख दीं। मान्यता है कि जब यमराज राजकुमार के प्राण लेने पहुंचे तो दीपकों की चमक और पत्नी की भक्ति के कारण वे ऐसा नहीं कर सके। इसी कथा को यम दीपदान की परंपरा से जोड़ा जाता है।
धनतेरस पर किन देवी-देवताओं की होती है पूजा?
धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि, मां लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। भगवान धन्वंतरि को आरोग्य का देवता माना जाता है, इसलिए उनकी पूजा करके परिवार के अच्छे स्वास्थ्य की कामना की जाती है। मां लक्ष्मी धन और वैभव की देवी हैं, जबकि भगवान कुबेर को धन का संरक्षक माना जाता है। इस दिन नए सिक्के, बर्तन और आभूषण पूजा स्थल पर रखकर उनकी पूजा की जाती है।
धनतेरस पर दीपदान करते समय किन बातों का रखें ध्यान?
परंपरा के अनुसार, यम दीपदान के लिए मिट्टी का दीपक लिया जाता है और उसमें सरसों का तेल या परिवार की परंपरा के अनुसार तेल भरा जाता है। दीपक को शाम के समय घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर रखा जाता है। दीपक जलाते समय यमराज से परिवार की सुख-शांति और मंगल की कामना की जाती है। अलग-अलग क्षेत्रों में दीपदान की विधि और समय में अंतर हो सकता है, इसलिए अपनी पारिवारिक परंपरा का पालन करना उचित माना जाता है।
यह लेख धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं और पारंपरिक रीति-रिवाजों पर आधारित है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में पूजा-विधि तथा परंपराओं में अंतर हो सकता है।



