सऊदी अरब की चीन को दोटूक, हूती हमलों के बीच तटस्थता पर उठाए सवाल

सऊदी अरब ने हूती विद्रोहियों के हमलों और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चीन की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रिंस तुर्की अल-फैसल ने कहा कि चीन को यह दिखाना होगा कि वह सऊदी अरब और ईरान के बीच निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में काम कर रहा है। तुर्की अल-फैसल सऊदी अरब की खुफिया एजेंसी के पूर्व प्रमुख और किंग फैसल सेंटर फॉर रिसर्च एंड इस्लामिक स्टडीज के अध्यक्ष हैं। उनके बयान ऐसे समय आए हैं, जब लाल सागर और खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ी हुई हैं।
2023 के समझौते का दिया हवाला
मार्च 2023 में चीन की मध्यस्थता से सऊदी अरब और ईरान ने अपने राजनयिक संबंध बहाल करने की दिशा में समझौता किया था। रियाद अब चाहता है कि बीजिंग क्षेत्र में तनाव कम करने और हूती हमलों को रोकने के प्रयासों में भी प्रभावी भूमिका निभाए। सऊदी पक्ष की चिंता है कि केवल मध्यस्थता की घोषणा पर्याप्त नहीं है; उसके मुताबिक, समझौते की उपयोगिता उसके वास्तविक परिणामों से तय होनी चाहिए।
चीन को दिए गए तीन प्रमुख संदेश
पहला संदेश: सऊदी अरब के मुताबिक, 2023 का बीजिंग समझौता किसी तरह की बिना शर्त गारंटी नहीं है। चीन की मध्यस्थता को क्षेत्र में तनाव कम करने के ठोस नतीजों के आधार पर देखा जाना चाहिए।
दूसरा संदेश: बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य की सुरक्षा केवल सऊदी अरब के लिए नहीं, बल्कि चीन की ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के लिए भी अहम है। इस मार्ग में व्यवधान से तेल और माल की आवाजाही प्रभावित हो सकती है।
तीसरा संदेश: हूती विद्रोहियों के हथियारों में कथित चीनी तकनीक या पुर्जों के इस्तेमाल की खबरों पर भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। हालांकि, हथियारों में चीनी तकनीक की भूमिका से जुड़े दावों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
चीन की प्रतिक्रिया और कूटनीतिक भूमिका
चीन ने सार्वजनिक रूप से सऊदी अरब के बुनियादी ढांचे पर हूती हमलों की निंदा की है और सभी पक्षों से तनाव बढ़ाने वाली कार्रवाई से बचने की अपील की है। बीजिंग ने संवाद और बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने पर जोर दिया है। दूसरी ओर, सऊदी अरब चाहता है कि चीन ईरान पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके हूती विद्रोहियों के हमलों को रोकने में मदद करे।
मध्य पूर्व और तेल आपूर्ति पर पड़ सकता है असर
बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए रणनीतिक महत्व रखता है। इस क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ने से जहाजों की आवाजाही, तेल निर्यात और परिवहन लागत प्रभावित हो सकती है। सऊदी अरब की चीन से मांग ऐसे समय में आई है, जब क्षेत्रीय शक्तियों के सामने कूटनीति, ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर कई चुनौतियां हैं।



