चीन ने हाल ही में एक बड़ा फैसला लेते हुए 74 देशों के नागरिकों को बिना वीजा प्रवेश की सुविधा देने की घोषणा की है। इस कदम को चीन की आर्थिक कूटनीति और पर्यटन को बढ़ावा देने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल है—क्या भारत इस लिस्ट में शामिल है?
फिलहाल सामने आई जानकारी के अनुसार, भारत को इस वीजा फ्री लिस्ट में शामिल नहीं किया गया है। चीन की इस नई नीति में मुख्य रूप से यूरोप, लैटिन अमेरिका, दक्षिण-पूर्व एशिया और कुछ अफ्रीकी देशों को प्राथमिकता दी गई है। अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, सिंगापुर, थाईलैंड जैसे देशों को वीजा फ्री यात्रा की अनुमति दी गई है, लेकिन भारत को इससे बाहर रखा गया है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को इस सूची से बाहर रखने के पीछे राजनीतिक और कूटनीतिक कारण हो सकते हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद, व्यापार तनाव और आपसी अविश्वास जैसी समस्याएं अभी भी जारी हैं। ऐसे में चीन की यह नीति कहीं न कहीं डिप्लोमैटिक संदेश भी देती है।
इसके अलावा, चीन इस नीति के माध्यम से वैश्विक पर्यटन को पुनर्जीवित करने और अपने घटते विदेशी निवेश को गति देने का प्रयास कर रहा है। लेकिन भारत को इससे दूर रखकर वह यह भी संकेत दे रहा है कि दोनों देशों के रिश्तों में अभी गर्मजोशी नहीं लौटी है।
चीन के इस फैसले को उसकी “सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी” का हिस्सा माना जा रहा है। कोरोना महामारी के बाद चीन की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचा है और पर्यटन तथा व्यापारिक रिश्तों में भारी गिरावट आई है। ऐसे में वीजा-फ्री एंट्री एक ऐसा कदम है जिससे वह दुनिया को फिर से अपने पक्ष में करना चाहता है, खासकर उन देशों को जो तकनीकी और निवेश के लिहाज से अहम हैं।
भारत का नाम इस सूची में न होना कोई सामान्य बात नहीं है। यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि भारत-चीन संबंध अभी भी अविश्वास और तनाव से भरे हुए हैं। 2020 में गलवान घाटी में हुए संघर्ष के बाद से दोनों देशों के बीच संबंधों में स्थायीत्व नहीं आया है। हालांकि व्यापार अब भी दोनों देशों के बीच जारी है, लेकिन रणनीतिक और राजनीतिक स्तर पर दोनों एक-दूसरे से दूरी बनाए हुए हैं।
चीन के इस निर्णय पर भारत सरकार की तरफ से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन कूटनीतिक हलकों में इस पर चर्चा तेज हो गई है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि चीन भारत पर दबाव बनाने के लिए इस तरह की ‘नरमी दिखाने की राजनीति’ उन देशों के साथ कर रहा है जिनसे उसे फिलहाल लाभ मिल सकता है, जबकि भारत जैसे देश अभी उसकी प्राथमिकता में नहीं हैं।



