ईरान के राष्ट्रपति ने अमेरिका और इजरायल पर हालिया हमलों को लेकर गहरी नाराजगी जताई है और कहा है कि इन घटनाओं ने भविष्य की किसी भी वार्ता पर भरोसे की बुनियाद हिला दी है। उनका बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिमी देश एक बार फिर ईरान को परमाणु समझौते की मेज पर लाने की कोशिश कर रहे हैं।
राष्ट्रपति का कहना है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की कथनी और करनी में भारी अंतर है। “हम पर सैन्य दबाव बनाकर फिर कूटनीतिक वार्ता की बात करना केवल दिखावा है,” उन्होंने कहा। इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान अब पहले की तरह ‘भरोसे के आधार पर’ वार्ता में शामिल नहीं होगा।
ईरान ने खासतौर पर इजरायल द्वारा की गई एक कथित गुप्त सैन्य कार्रवाई का उल्लेख करते हुए कहा कि यह देश की संप्रभुता का सीधा उल्लंघन है। राष्ट्रपति ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी सवाल किया कि वह इन हमलों पर चुप क्यों है।
यह बयान यह संकेत देता है कि अब ईरान की विदेश नीति और कूटनीतिक रुख अधिक सख्त और आत्मनिर्भर हो सकता है। अमेरिका और इजरायल के खिलाफ बढ़ती नाराजगी पश्चिम एशिया में नए तनाव की नींव रख सकती है।
ईरानी राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि यदि अमेरिका वास्तव में वार्ता चाहता है, तो उसे पहले क्षेत्रीय आक्रामकता और इजरायल के सैन्य हस्तक्षेप पर लगाम लगानी होगी। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ऐसे हमले जारी रहते हैं, तो ईरान अपने “रणनीतिक हितों” की रक्षा के लिए कोई भी कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा। इस बयान को क्षेत्रीय तनाव बढ़ाने वाला माना जा रहा है।
ईरान की तरफ से यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और यूरोपीय संघ 2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) को फिर से बहाल करने की कोशिशों में लगे हैं। लेकिन हालिया घटनाओं ने इस प्रयास को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। अब सवाल यह है कि क्या ईरान इन शर्तों में किसी भी बातचीत के लिए तैयार होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और इजरायल की नीतियों ने ईरान को और अधिक सख्त रुख अपनाने पर मजबूर कर दिया है। इससे ईरान रूस और चीन जैसे देशों के और करीब जा सकता है, जो अमेरिका-विरोधी गुट को मज़बूती देंगे। इससे वैश्विक स्तर पर नई शक्ति संतुलन की स्थिति उभर सकती है।



