
सोशल मीडिया के दौर में इंफ्लुएंसर का असर लोगों की सोच और फैसलों पर गहराई से पड़ रहा है। हाल ही में एक दर्दनाक घटना सामने आई जिसने यह साबित कर दिया कि बिना जांचे-परखे किसी की बातों में आकर बड़ा कदम उठाना कितना खतरनाक हो सकता है। एक मां, जो इंस्टाग्राम पर मातृत्व और प्राकृतिक प्रसव से जुड़े कंटेंट को फॉलो कर रही थी, एक इंफ्लुएंसर की सलाह पर घर पर ही बच्चे को जन्म देने का निर्णय ले बैठी। यह निर्णय उसके नवजात शिशु के लिए जानलेवा साबित हुआ।
रिपोर्ट के अनुसार, उस मां ने अस्पताल जाने की बजाय “होम-बर्थिंग पूल” का इस्तेमाल करने का फैसला किया। इंफ्लुएंसर के पोस्ट और वीडियो में दावा किया गया था कि घर पर पानी में जन्म देना सुरक्षित, आरामदायक और “प्राकृतिक” होता है। लेकिन इन दावों के पीछे किसी भी तरह की मेडिकल रिसर्च या विशेषज्ञ की सलाह नहीं थी। मां ने पूरी प्रक्रिया के लिए आवश्यक चिकित्सकीय उपकरण और प्रशिक्षित हेल्थ प्रोफेशनल की मौजूदगी सुनिश्चित नहीं की। नतीजा यह हुआ कि डिलीवरी के दौरान गंभीर जटिलताएं पैदा हुईं और नवजात को तुरंत जरूरी मेडिकल सहायता नहीं मिल पाई।
डिलीवरी के समय नवजात को सांस लेने में दिक्कत हुई और पानी में डूबने जैसी स्थिति पैदा हो गई। परिवार के लोग घबराकर अस्पताल पहुंचे, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने बच्ची को बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन उसे मृत घोषित करना पड़ा।
विशेषज्ञों का कहना है कि होम-बर्थिंग, खासकर पानी में प्रसव, तभी सुरक्षित माना जा सकता है जब प्रशिक्षित मिडवाइफ या डॉक्टर मौजूद हों और आपातकालीन स्थितियों के लिए तुरंत अस्पताल ले जाने की सुविधा हो। सोशल मीडिया पर दिखाए जाने वाले अनुभव अक्सर पूरी सच्चाई नहीं बताते, बल्कि चमक-धमक और “परफेक्ट मोमेंट” दिखाने के लिए एडिट किए जाते हैं।
यह घटना न केवल एक मासूम जान के खोने की त्रासदी है, बल्कि यह सोशल मीडिया पर फैल रहे गलत और भ्रामक स्वास्थ्य संबंधी कंटेंट के खतरों की भी चेतावनी है। भारत सहित कई देशों में स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार यह सलाह देते हैं कि गर्भावस्था और प्रसव से जुड़े निर्णय केवल प्रशिक्षित चिकित्सक की देखरेख में लिए जाएं।
मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि सोशल मीडिया पर लगातार “आदर्श मातृत्व” और “प्राकृतिक जन्म” की तस्वीरें देखने से कई महिलाएं दबाव महसूस करती हैं और बिना सोचे-समझे जोखिम उठाने लगती हैं। ऐसे में परिवार और समाज की जिम्मेदारी है कि वे सही जानकारी और चिकित्सकीय सलाह को प्राथमिकता दें, न कि वायरल ट्रेंड्स को।
यह दुखद घटना हर उस व्यक्ति के लिए सबक है जो सोशल मीडिया पर स्वास्थ्य संबंधी टिप्स को आंख मूंदकर मान लेता है। जीवन और मृत्यु के फैसले कभी भी सिर्फ ऑनलाइन देखी या सुनी बातों पर आधारित नहीं होने चाहिए। इंटरनेट प्रेरणा का स्रोत हो सकता है, लेकिन अंतिम निर्णय हमेशा विशेषज्ञ की राय और वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर ही लेना चाहिए—वरना परिणाम अपूरणीय हो सकते हैं।



