Ganesh Chaturthi 2025: भगवान गणेश को क्यों कहा जाता है ‘विघ्नराज’? जानें पूरी पौराणिक कथा

गणेश चतुर्थी 2025 का पर्व पूरे देश में बड़े ही उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। यह पर्व भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में जाना जाता है। गणपति बप्पा को बुद्धि, विवेक, ज्ञान और समृद्धि का देवता माना जाता है। उन्हें प्रथम पूज्य देवता कहा गया है, जिनकी आराधना बिना किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत अधूरी मानी जाती है। भगवान गणेश को ‘विघ्नराज’ और ‘विघ्नहर्ता’ दोनों ही नामों से पुकारा जाता है। इसका कारण एक विशेष पौराणिक कथा से जुड़ा है, जो यह बताती है कि गणेश जी को यह उपाधि क्यों और कैसे प्राप्त हुई।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक समय देवताओं और असुरों के बीच निरंतर संघर्ष हो रहे थे। असुरों के राजा ‘विघ्नासुर’ ने अपनी तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर अमोघ शक्ति प्राप्त कर ली। उसने यह वरदान मांगा कि वह हर शुभ कार्य और यज्ञ में विघ्न डाल सके। शिवजी के वरदान से शक्तिशाली होकर विघ्नासुर ने देवताओं और ऋषि-मुनियों के धार्मिक कार्यों को बाधित करना शुरू कर दिया। हर यज्ञ अधूरा रह जाता और देवताओं की शक्ति क्षीण होने लगी।
तब सभी देवता भगवान शिव और माता पार्वती के पास पहुंचे और विनती की कि इस संकट से मुक्ति दिलाई जाए। माता पार्वती ने अपने पुत्र गणेश को इस कार्य हेतु भेजा। गणेश जी ने विघ्नासुर से युद्ध किया और अपनी बुद्धि और बल से उसे पराजित कर दिया। पराजय के बाद विघ्नासुर ने भगवान गणेश के चरणों में शरण ली और प्रार्थना की कि उसे क्षमा कर दिया जाए।
भगवान गणेश ने विघ्नासुर को दया पूर्वक क्षमा कर दिया, लेकिन साथ ही यह आदेश दिया कि अब से वह उनके ही अधीन रहेगा। उन्होंने कहा कि जब तक किसी भी पूजा या कार्य में मेरी आराधना नहीं की जाएगी, तब तक विघ्न अवश्य आएंगे। परंतु जहां-जहां मेरी पूजा होगी, वहां कोई विघ्न नहीं डालेगा। उसी समय से भगवान गणेश को ‘विघ्नराज’ और ‘विघ्नहर्ता’ की उपाधि प्राप्त हुई।
यह कथा स्पष्ट करती है कि किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत में गणपति की पूजा क्यों अनिवार्य है। गणेश जी केवल विघ्न डालने वाले ‘विघ्नराज’ ही नहीं बल्कि उन्हें दूर करने वाले ‘विघ्नहर्ता’ भी हैं। यही कारण है कि हर व्रत, यज्ञ, विवाह, गृह प्रवेश या किसी भी मंगल कार्य की शुरुआत श्री गणेश की स्तुति से की जाती है।
गणेश चतुर्थी के अवसर पर भक्तजन अपने घरों और पंडालों में गणेश जी की मूर्ति स्थापित करते हैं और दस दिनों तक पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। इस पर्व का धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व इतना अधिक है कि यह केवल एक उत्सव नहीं बल्कि जीवन में बाधाओं को दूर कर सफलता और समृद्धि का प्रतीक बन चुका है।



