हरितालिका तीज व्रत: सोना चाहिए या नहीं, पानी कब पिएं? जानें 5 अहम सवालों के जवाब

हरितालिका तीज व्रत का महत्व हिंदू धर्म में अत्यधिक माना गया है। यह व्रत मुख्य रूप से सुहागिन महिलाएं और अविवाहित कन्याएं करती हैं। सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत रखती हैं, वहीं अविवाहित कन्याएं अच्छे वर की प्राप्ति के लिए इसे करती हैं। इस व्रत से जुड़ी कई परंपराएं और नियम हैं, जिन्हें जानना जरूरी है। अक्सर महिलाओं के मन में सवाल उठते हैं कि हरितालिका तीज के व्रत में सोना चाहिए या नहीं, पानी कब पी सकते हैं और किन नियमों का पालन अनिवार्य है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हरितालिका तीज का व्रत निर्जला उपवास के रूप में रखा जाता है। इसका अर्थ है कि व्रती दिनभर जल तक ग्रहण नहीं करती। व्रत सूर्योदय से प्रारंभ होकर अगले दिन प्रातःकाल पूजा-अर्चना और पारण के बाद संपन्न होता है। पारंपरिक मान्यता है कि इस व्रत के दौरान सोना वर्जित माना जाता है। रातभर जागरण कर भगवान शिव-पार्वती की कथा सुनना और भजन-कीर्तन करना अत्यंत शुभ माना जाता है। हालांकि, यदि स्वास्थ्य कारणों से जागरण संभव न हो तो श्रद्धा और सामर्थ्य अनुसार विश्राम लिया जा सकता है, क्योंकि भगवान भक्ति और निष्ठा को अधिक महत्व देते हैं।
इस व्रत के दौरान जल ग्रहण करने को लेकर भी स्पष्ट मान्यता है। व्रत के समय दिनभर पानी पीना वर्जित है। केवल अगले दिन व्रत खोलते समय ही जल और फलाहार ग्रहण किया जाता है। इस दिन महिलाएं हरे वस्त्र, सोलह शृंगार और सुहाग चिन्हों से सजकर शिव-पार्वती की पूजा करती हैं। पूजा में विशेष रूप से बेलपत्र, सुहाग की सामग्री, फल-फूल और श्रृंगार का सामान अर्पित किया जाता है।
- हरितालिका तीज का व्रत केवल नियमों के पालन से नहीं, बल्कि श्रद्धा और आस्था से पूर्ण होता है। कहा जाता है कि मां पार्वती ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था, उसी तपस्या की स्मृति में यह व्रत किया जाता है। इसलिए इस व्रत का पालन स्त्रियों को आत्मिक शांति, वैवाहिक सुख और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।



