
तुर्की के राष्ट्रपति रेचप तैयप एर्दोगन ने सितंबर 2025 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 80वें सत्र में एक बार फिर कश्मीर का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि कश्मीर विवाद का समाधान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों और बातचीत के जरिए होना चाहिए, जिससे कश्मीर में रहने वाले लोगों के हितों की रक्षा हो सके। एर्दोगन ने भारत और पाकिस्तान से आग्रह किया कि वे इस मसले को सुलझाने के लिए संयुक्त राष्ट्र की मदद लें और आतंकवाद विरोधी सहयोग बढ़ाएं। उन्होंने दोनों देशों के बीच हाल की सीजफायर पर भी संतोष व्यक्त किया और शांति बनाए रखने की बलशाली इच्छा जताई।
यह पहला मौका नहीं है जब एर्दोगन ने यूएन में कश्मीर पर बात की हो। 2019 से अब तक वे छह बार इस मुद्दे को प्रमुखता से उठा चुके हैं और बार-बार कश्मीरियों के समर्थन का दावा किया है। तुर्की की यह रणनीति पाकिस्तान के साथ करीबी दोस्ती का संकेत भी है। भारत ने इस पर सख्त रुख रखते हुए कश्मीर को अपना आंतरिक मामला बताया है और तुर्की से अपनी संप्रभुता के सम्मान की मांग की है। दोनों देशों के बीच इस विषय पर मतभेद जारी हैं, और भारत ने स्पष्ट किया है कि कश्मीर विवाद केवल भारत और पाकिस्तान के बीच है, इसे किसी तीसरे पक्ष के मंच पर नहीं ले जाना चाहिए।
तुर्की के इस बयान को भारत में आलोचना मिली है क्योंकि इसे पाकिस्तान के एजेंडे का समर्थन माना जाता है। हालांकि एर्दोगन की यह गतिविधि उनके देश की घरेलू राजनीति में इस्लामिक वोटबैंक को ध्यान में रखकर भी की जाती है। यूएन महासभा में एर्दोगन ने इजरायल के खिलाफ भी कठोर भाषा का इस्तेमाल किया, विशेषकर गाजा संघर्ष के संदर्भ में। कुल मिलाकर, तुर्की का इस तरह कश्मीर मुद्दा बार-बार उठाना क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीतिक तनाव का संकेत है, जो भारत-पाकिस्तान विवाद की जटिलता को दर्शाता है।



