
संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में इस बार दुनिया ने एक ऐसा पल देखा जिसने सभी को हैरान भी किया और प्रेरित भी। दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम देश के राष्ट्रपति ने मंच से ऐसा धाकड़ भाषण दिया कि पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। उन्होंने वैश्विक मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखी—चाहे वह जलवायु परिवर्तन का संकट हो, युद्ध की तबाही हो, या फिर आर्थिक असमानता का सवाल, हर विषय पर उन्होंने बिना किसी झिझक के बड़े देशों की जिम्मेदारी तय की। राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में खास तौर पर कहा कि दुनिया को अब विकास बनाम युद्ध की बहस से आगे बढ़ना होगा। अगर धरती को बचाना है, तो महाशक्तियों को हथियारों की होड़ रोककर शांति और सहयोग की राह अपनानी होगी।
अपने भाषण में उन्होंने मध्य-पूर्व और एशिया में बढ़ते तनाव पर भी गंभीर चिंता जताई और यह साफ संदेश दिया कि एक देश की असुरक्षा पूरे क्षेत्र की अस्थिरता में बदल सकती है। उन्होंने पश्चिमी देशों से अपील की कि वे केवल संसाधनों का दोहन न करें बल्कि छोटे-छोटे देशों की मदद करें ताकि वैश्विक असमानता कम हो सके। राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र तभी प्रभावी हो सकता है जब उसकी नीतियां सबके लिए समान हो और कोई देश खुद को कानून से ऊपर न समझे।
लेकिन असली ऐतिहासिक पल तब आया जब अपने भाषण के अंत में राष्ट्रपति ने अचानक संस्कृत शब्दों का प्रयोग किया। उन्होंने मंच से कहा—“ओम शांति, शांति ओम।” इस वाक्य ने न केवल सभागार में बैठे सभी मेहमानों को भावुक कर दिया बल्कि पूरे विश्व को एक शांति का संदेश दिया। मुस्लिम देश के राष्ट्रपति द्वारा हिंदू संस्कृति के इस शांति मंत्र का उच्चारण एकता और सद्भाव का प्रतीक बना। यह इस बात का संकेत था कि धर्म, संस्कृति या भाषा की सीमाओं से परे असल जरूरत इंसानियत और शांति की है।
उनका यह भाषण सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और दुनियाभर के लोग इस संदेश को सराह रहे हैं। कई नेताओं और बुद्धिजीवियों ने इसे “सभ्यताओं के मिलन का क्षण” बताया। जाहिर है, राजनीति और संघर्षों से भरे इस दौर में जब सबसे बड़े मुस्लिम देश का राष्ट्रपति शांति का संस्कृत मंत्र बोलता है, तो यह दुनिया को जोड़ने वाला संदेश बन जाता है।



