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पाकिस्तान को रास नहीं आ रहा भारत-अफगानिस्तान का बढ़ता दोस्ताना, ख्वाजा आसिफ ने साधा निशाना

भारत और अफगानिस्तान के बीच बढ़ती नजदीकियां पाकिस्तान को खटक रही हैं। हाल ही में पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक विवादित बयान देते हुए कहा कि “अब काबुल की डोर दिल्ली के हाथों में है।” उनके इस बयान से यह साफ जाहिर होता है कि पाकिस्तान, भारत-अफगानिस्तान के मजबूत होते संबंधों से गहरी बेचैनी महसूस कर रहा है। ख्वाजा आसिफ ने अपने बयान में भारत पर यह आरोप लगाया कि वह अफगानिस्तान की आंतरिक नीतियों में दखल दे रहा है और वहां अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की यह चिंता नई नहीं है। अफगानिस्तान में भारत की साख लंबे समय से बनी हुई है। भारत ने अफगानिस्तान में सड़कों, अस्पतालों, स्कूलों और संसद भवन जैसी कई बड़ी परियोजनाओं में योगदान दिया है। वहीं, तालिबान शासन के बाद भी भारत ने अफगान जनता के मानवीय हितों को ध्यान में रखते हुए खाद्यान्न, दवाइयां और आर्थिक सहायता पहुंचाई। यही वजह है कि काबुल की जनता भारत को एक विश्वसनीय साथी के रूप में देखती है।

दूसरी ओर, पाकिस्तान को यह डर सताता रहता है कि अगर भारत का प्रभाव अफगानिस्तान में बढ़ता है, तो उसका रणनीतिक दबदबा क्षेत्र में कमजोर पड़ जाएगा। ख्वाजा आसिफ का बयान इसी चिंता का परिणाम बताया जा रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान ने लंबे समय तक अफगानिस्तान को अपनी “रणनीतिक गहराई” के रूप में देखा, लेकिन अब यह स्थिति बदल रही है।

भारत ने हमेशा अफगानिस्तान के साथ “विकास आधारित साझेदारी” की बात की है, जबकि पाकिस्तान की नीति सुरक्षा और प्रभाव पर केंद्रित रही है। यही फर्क दोनों देशों की छवि को अलग करता है। भारत की यह कोशिश है कि अफगानिस्तान को स्थिरता, शिक्षा और विकास के रास्ते पर आगे बढ़ाया जाए।

ख्वाजा आसिफ का यह बयान न केवल पाकिस्तान की असुरक्षा को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि दक्षिण एशिया की राजनीति में भारत की भूमिका लगातार मजबूत होती जा रही है। अफगानिस्तान में भारत की सक्रियता आने वाले समय में इस क्षेत्र की रणनीतिक संतुलन को नया रूप दे सकती है।

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