
पिछले 12 महीनों में करीब 18 हजार करोड़ रुपये के चंदे का आंकड़ा सामने आते ही वैश्विक राजनीति में हलचल तेज हो गई है। यह चंदा सीधे तौर पर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से जुड़े अभियानों, संगठनों और फंडरेजिंग नेटवर्क तक पहुंचा बताया जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि इस फंड में सिर्फ अमेरिकी दानदाताओं का ही नहीं, बल्कि कई विदेशी देशों और वहां से जुड़े कारोबारी समूहों का भी बड़ा योगदान रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चंदा सिर्फ समर्थन नहीं, बल्कि ट्रंप को खुश करने और भविष्य की अमेरिकी नीतियों पर असर डालने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
सूत्रों के मुताबिक, मध्य पूर्व, यूरोप और एशिया के कुछ प्रभावशाली देशों से जुड़े अमीर उद्योगपतियों और लॉबिंग ग्रुप्स ने खुलकर पैसा लगाया। इन देशों को उम्मीद है कि अगर ट्रंप दोबारा सत्ता में आते हैं, तो व्यापार, हथियार सौदों, ऊर्जा नीति और भू-राजनीतिक फैसलों में उन्हें फायदा मिल सकता है। खासकर तेल-गैस, डिफेंस और रियल एस्टेट सेक्टर से जुड़े लोगों ने ट्रंप समर्थक फंड्स में भारी निवेश किया। यही वजह है कि 12 महीनों में यह राशि 18 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गई।
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप की छवि एक मजबूत और सौदेबाज़ नेता की रही है। कई देश मानते हैं कि ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है, लेकिन सही सौदे और समर्थन मिलने पर वह रणनीतिक साझेदारों को बड़े फायदे भी दे सकता है। इसी सोच के तहत कुछ देशों ने ‘निवेश’ के तौर पर यह चंदा दिया है, ताकि भविष्य में उन्हें कूटनीतिक और आर्थिक लाभ मिल सके।
हालांकि, इस पूरे मामले पर विवाद भी गहराता जा रहा है। आलोचकों का आरोप है कि विदेशी पैसे का इस तरह राजनीतिक अभियानों में आना लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है। अमेरिकी कानूनों में विदेशी फंडिंग को लेकर सख्त नियम हैं, लेकिन ट्रंप से जुड़े कई सुपर PACs और थिंक टैंक्स ऐसे रास्ते अपनाते हैं, जिनसे पैसा अप्रत्यक्ष रूप से पहुंच जाता है। यही कारण है कि अब जांच एजेंसियों और विपक्षी नेताओं की नजर इस 18 हजार करोड़ के चंदे पर टिकी हुई है।
कुल मिलाकर, यह मामला सिर्फ पैसे का नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति, प्रभाव और सत्ता संतुलन का है। आने वाले समय में यह साफ हो जाएगा कि ट्रंप को खुश करने के लिए लुटाया गया यह खजाना किन देशों के लिए फायदेमंद साबित होता है और किनके लिए विवाद का कारण बनता है।



