
डूम्सडे क्लॉक को दुनिया की सबसे डरावनी घड़ियों में से एक माना जाता है। यह कोई आम घड़ी नहीं है, बल्कि एक प्रतीकात्मक संकेत है, जो यह बताता है कि मानवता खुद को वैश्विक तबाही के कितने करीब ले आई है। जब कहा जाता है कि डूम्सडे क्लॉक “आधी रात से सिर्फ 85 सेकंड दूर” है, तो इसका अर्थ यह है कि दुनिया परमाणु युद्ध, जलवायु संकट और तकनीकी खतरों जैसी गंभीर चुनौतियों के बेहद नजदीक खड़ी है। आधी रात यहां पूर्ण विनाश का प्रतीक मानी जाती है।
डूम्सडे क्लॉक की शुरुआत साल 1947 में अमेरिका की “बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स” संस्था ने की थी। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब परमाणु बम का खतरा सामने आया, तब वैज्ञानिकों ने यह महसूस किया कि दुनिया को एक चेतावनी संकेत की जरूरत है। इसी सोच से डूम्सडे क्लॉक का जन्म हुआ। शुरू में यह घड़ी आधी रात से 7 मिनट दूर रखी गई थी, लेकिन समय के साथ-साथ वैश्विक हालात के अनुसार इसकी सुई आगे-पीछे होती रही।
आज डूम्सडे क्लॉक का समय तय करते वक्त केवल परमाणु हथियारों को ही नहीं देखा जाता, बल्कि जलवायु परिवर्तन, जैविक खतरे, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अंतरराष्ट्रीय तनाव जैसे मुद्दों को भी ध्यान में रखा जाता है। रूस-यूक्रेन युद्ध, परमाणु हथियारों की होड़, ग्लोबल वॉर्मिंग और तकनीकी दुरुपयोग जैसे कारणों से वैज्ञानिकों का मानना है कि मानवता पहले से कहीं ज्यादा खतरे में है। यही वजह है कि घड़ी की सुई को 85 सेकंड तक आगे बढ़ाया गया है, जो अब तक का सबसे खतरनाक स्तर माना जा रहा है।
डूम्सडे क्लॉक को “तबाही की घड़ी” इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह सीधे तौर पर दुनिया के विनाश की संभावना को दर्शाती है। यह घड़ी डर फैलाने के लिए नहीं, बल्कि चेतावनी देने के लिए बनाई गई है, ताकि विश्व के नेता और आम लोग समय रहते समझदारी से फैसले लें। इसका संदेश साफ है—अगर मानवता ने युद्ध, पर्यावरण और तकनीक के मोर्चे पर जिम्मेदारी नहीं दिखाई, तो आधी रात यानी विनाश का पल दूर नहीं है।
कुल मिलाकर, डूम्सडे क्लॉक हमें यह याद दिलाती है कि भविष्य हमारे हाथ में है। सही नीतियां, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और शांति की सोच ही इस घड़ी की सुई को पीछे ले जा सकती है और दुनिया को तबाही से बचा सकती है।



