
अमेरिकी नेतृत्व वाले ‘पैक्स सिलिका’ में भारत की संभावित एंट्री को वैश्विक रणनीति और उभरती तकनीकी राजनीति के संदर्भ में बेहद अहम माना जा रहा है। ‘पैक्स’ शब्द आमतौर पर किसी महाशक्ति के नेतृत्व में स्थापित वैश्विक व्यवस्था के लिए इस्तेमाल होता है, जैसे United States के संदर्भ में ‘पैक्स अमेरिकाना’। वहीं ‘सिलिका’ यहां सेमीकंडक्टर और चिप निर्माण से जुड़ी उस तकनीकी दुनिया का प्रतीक है, जो आज डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुकी है। इस पहल का मकसद भरोसेमंद देशों के बीच उन्नत चिप, एआई हार्डवेयर, रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स और संवेदनशील तकनीक की सुरक्षित सप्लाई चेन तैयार करना है, ताकि रणनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर निर्भरता कम की जा सके।
भारत के लिए यह कदम कई स्तरों पर फायदेमंद साबित हो सकता है। पहला, सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग में निवेश और तकनीक ट्रांसफर की संभावनाएं बढ़ेंगी। दूसरा, वैश्विक कंपनियां भारत को ‘चीन प्लस वन’ रणनीति के तहत एक भरोसेमंद निर्माण हब के रूप में देख सकती हैं। तीसरा, रक्षा और साइबर सुरक्षा सहयोग को मजबूती मिलेगी। भारत पहले ही Japan और Australia जैसे साझेदारों के साथ इंडो-पैसिफिक रणनीति में सक्रिय है, ऐसे में ‘पैक्स सिलिका’ जैसी पहल उसे तकनीकी गठबंधनों के केंद्र में ला सकती है।
आर्थिक दृष्टि से देखें तो इससे उच्च कौशल वाली नौकरियां, रिसर्च एंड डेवलपमेंट केंद्र और निर्यात के नए अवसर खुल सकते हैं। भारत सरकार की सेमीकंडक्टर प्रोत्साहन योजनाओं को भी अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिलेगा। साथ ही, डेटा सुरक्षा और भरोसेमंद डिजिटल इकोसिस्टम के निर्माण में भारत की भूमिका मजबूत होगी।
हालांकि, चुनौतियां भी कम नहीं हैं। उन्नत चिप निर्माण के लिए भारी पूंजी, स्थिर नीतियां और अत्याधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होगी। इसके अलावा, वैश्विक शक्ति संतुलन में किसी एक ब्लॉक के करीब जाने से कूटनीतिक संतुलन साधना भी जरूरी होगा। फिर भी, अगर रणनीतिक सूझबूझ के साथ कदम बढ़ाए जाएं तो ‘पैक्स सिलिका’ में भारत की भागीदारी उसे 21वीं सदी की तकनीकी व्यवस्था में अग्रणी स्थान दिला सकती है।



