
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने सेवा को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि सेवा किसी पर किया गया अहसान नहीं होती, बल्कि यह हर व्यक्ति का कर्तव्य है। उनके इस बयान को समाज में सकारात्मक सोच और जिम्मेदारी की भावना को बढ़ावा देने वाला माना जा रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब हम सेवा को अहसान समझते हैं, तो उसमें अहंकार का भाव आ जाता है, जबकि कर्तव्य के रूप में की गई सेवा में समर्पण और विनम्रता होती है।
अपने संबोधन में उन्होंने बताया कि भारतीय संस्कृति में सेवा को हमेशा सर्वोच्च स्थान दिया गया है। यहां दूसरों की मदद करना, समाज के कमजोर वर्गों का सहारा बनना और जरूरतमंदों के लिए आगे आना जीवन का मूल उद्देश्य माना गया है। उन्होंने कहा कि यदि हर व्यक्ति अपने कर्तव्यों को समझकर कार्य करे, तो समाज में कई समस्याएं स्वतः समाप्त हो सकती हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि सेवा का असली अर्थ केवल दान देना या मदद करना नहीं है, बल्कि अपने आसपास के लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए निरंतर प्रयास करना है। चाहे वह शिक्षा के क्षेत्र में योगदान हो, स्वास्थ्य सेवाओं में सहयोग हो या पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करना—हर क्षेत्र में सेवा की भावना जरूरी है।
मोहन भागवत ने युवाओं को विशेष रूप से प्रेरित करते हुए कहा कि वे समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझें और सक्रिय रूप से सेवा कार्यों में भाग लें। उनका मानना है कि युवा शक्ति अगर सही दिशा में काम करे, तो देश के विकास में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सेवा के कार्यों में किसी प्रकार के भेदभाव की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र के आधार पर भेदभाव किए बिना सभी के लिए समान भाव से कार्य करना ही सच्ची सेवा है।
अंत में उन्होंने कहा कि सेवा भाव को अपने जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए। यह न केवल समाज को मजबूत बनाता है, बल्कि व्यक्ति के व्यक्तित्व को भी निखारता है। उनका यह संदेश आज के समय में बेहद प्रासंगिक है, जब समाज को एकजुटता और सहयोग की सबसे ज्यादा जरूरत है।



