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हिमालयन वियाग्रा यार्सागुम्बा क्यों बिक रहा सस्ता? जानें वजह

नेपाल का यार्सागुम्बा, जिसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में अक्सर ‘Himalayan Viagra’ कहा जाता है, कभी बेहद महंगे औषधीय उत्पादों में गिना जाता था। लेकिन 2026 में इसके दाम और इससे होने वाली कमाई में तेज गिरावट ने पहाड़ी इलाकों के हजारों संग्रहकर्ताओं और कारोबारियों की चिंता बढ़ा दी है।

कभी यार्सागुम्बा की कीमत 32 लाख नेपाली रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई थी। अब कई संग्रहकर्ताओं को प्रति पीस सिर्फ 700 से 1,000 नेपाली रुपये मिल रहे हैं। इसकी बड़ी वजह उत्पादन में कमी, गुणवत्ता में गिरावट और चीन से आने वाले खरीदारों की संख्या कम होना बताई जा रही है।

क्या है यार्सागुम्बा?

यार्सागुम्बा एक दुर्लभ कॉर्डिसेप्स (Ophiocordyceps sinensis) है, जो हिमालय के ऊंचाई वाले घास के मैदानों में पाया जाता है। यह एक कैटरपिलर के शरीर से जुड़ी फंगस संरचना के रूप में विकसित होता है। पारंपरिक चीनी चिकित्सा में इसे लंबे समय से महत्व दिया जाता रहा है।

इसी ऊंची कीमत और पारंपरिक उपयोग के कारण इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘Himalayan Viagra’ जैसे नाम से प्रचारित किया गया। हालांकि इसके यौन क्षमता बढ़ाने वाले दावों को वैज्ञानिक रूप से स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखना चाहिए।

कभी 32 लाख रुपये किलो तक थी कीमत

नेपाल के कर्णाली क्षेत्र में यार्सागुम्बा की कीमत महामारी से पहले 32 लाख नेपाली रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसमें लगातार गिरावट आई है। कारोबारियों और संग्रहकर्ताओं के लिए समस्या यह है कि ऊंचे पहाड़ों तक पहुंचने, खाने-पीने और रहने का खर्च बढ़ रहा है, जबकि बिक्री से होने वाली आमदनी घट रही है।

2026 में कुछ क्षेत्रों में संग्रहकर्ताओं को यार्सागुम्बा के लिए करीब 700 से 1,000 रुपये प्रति पीस मिल रहे हैं। ऐसे में कई परिवारों के लिए कई दिनों या हफ्तों तक खतरनाक पहाड़ी इलाकों में रहकर इसे इकट्ठा करना पहले जितना आर्थिक रूप से लाभकारी नहीं रह गया है।

चीन के खरीदारों ने क्यों बनाई दूरी?

यार्सागुम्बा का सबसे बड़ा बाजार चीन रहा है। कर्णाली की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, क्षेत्र में उत्पादित यार्सागुम्बा का करीब 90 प्रतिशत चीन जाता था। लेकिन स्थानीय अधिकारियों और कारोबारियों के मुताबिक इस साल चीनी व्यापारी पहले की तरह नेपाल नहीं पहुंच रहे हैं। इसका एक कारण चीन में स्थानीय स्तर पर यार्सागुम्बा का संग्रह बढ़ना बताया जा रहा है।

जब खरीदार कम हुए तो नेपाल के स्थानीय व्यापारियों के लिए भी संग्रहकर्ताओं से माल खरीदना मुश्किल हो गया। नतीजा यह हुआ कि पहाड़ी इलाकों में उत्पाद उपलब्ध होने के बावजूद उसे बेचने के लिए पर्याप्त खरीदार नहीं मिल रहे हैं।

उत्पादन भी लगातार घट रहा

कीमत गिरने की दूसरी बड़ी वजह उत्पादन में कमी है। कर्णाली में यार्सागुम्बा का उत्पादन 2018-19 में करीब 1,609 किलोग्राम था, जो पिछले साल लगभग 494 किलोग्राम रह गया।

अन्य रिपोर्टों में भी पिछले दशक के दौरान उत्पादन और परिवहन की मात्रा में गिरावट दर्ज की गई है। विशेषज्ञों ने अनियमित बारिश, जलवायु परिवर्तन, आवास में बदलाव, जंगलों में आग और अत्यधिक मानवीय दबाव जैसे कई कारणों की ओर इशारा किया है।

संग्रहकर्ताओं की कमाई पर दोहरी मार

यार्सागुम्बा खोजने के लिए लोगों को बेहद ऊंचाई वाले और दुर्गम इलाकों में जाना पड़ता है। कई परिवार इसके लिए हजारों रुपये भोजन, उपकरण और यात्रा पर खर्च करते हैं। लेकिन कम उत्पादन और घटती कीमतों के कारण कई बार बिक्री से मिली रकम खर्च के मुकाबले बहुत कम बचती है।

2026 की एक रिपोर्ट में कर्णाली के एक परिवार का उदाहरण दिया गया है, जिसने संग्रह अभियान पर करीब 60 हजार रुपये खर्च किए और लगभग 1.2 लाख रुपये की बिक्री की। जोखिम और मेहनत को देखते हुए स्थानीय लोगों के मुताबिक यह आमदनी पहले की तुलना में काफी कम है।

सिर्फ कीमत नहीं, पूरा कारोबार बदल रहा

यार्सागुम्बा की कीमत में गिरावट को केवल ‘मांग खत्म होने’ की कहानी कहना सही नहीं होगा। इसके पीछे कम उत्पादन, खराब होती गुणवत्ता, चीन से खरीदारों की कमी और ऊंची संग्रह लागत जैसे कई कारक एक साथ काम कर रहे हैं।

इसके अलावा अत्यधिक संग्रह को लेकर पर्यावरणीय चिंता भी लंबे समय से बनी हुई है। वैज्ञानिक अध्ययनों और पर्यावरणीय रिपोर्टों में यार्सागुम्बा के अत्यधिक दोहन से हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर संभावित दबाव की बात कही गई है।

इसलिए 30 लाख रुपये या उससे अधिक की पुरानी कीमत और आज की कम कीमत के बीच का अंतर केवल बाजार की कहानी नहीं है। यह हिमालय में बदलते उत्पादन, जलवायु परिस्थितियों, अंतरराष्ट्रीय मांग और चीन-नेपाल व्यापार नेटवर्क में आए बदलाव का भी संकेत है।

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