बदरीनाथ धाम में शंख न बजाने को लेकर अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी की तपस्या में बाधा न पड़े इसलिए शंख नहीं बजाया था। एक अन्य मान्यता में शंखचूड़ से जुड़ी कथा का उल्लेख मिलता है। बदरीनाथ में शंख वादन की परंपरा को लेकर धार्मिक और स्थानीय व्याख्याएं अलग-अलग हैं, इसलिए इन्हें मान्यता के रूप में ही देखा जाता है।
सितंबर 2026 में बदरीनाथ के टूरिस्ट अराइवल प्लाजा में ‘देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल-2026’ आयोजित किया गया था। यह आयोजन सेना के ऑपरेशन सद्भावना के तहत चमोली जिला प्रशासन और उत्तराखंड पर्यटन विभाग के सहयोग से हुआ था। कार्यक्रम का उद्देश्य उत्तराखंड की लोक संस्कृति, स्थानीय उत्पादों और सीमावर्ती गांवों की परंपराओं को सामने लाना बताया गया था।
कार्यक्रम के दौरान तेज आवाज में संगीत और कलाकारों की प्रस्तुतियों के वीडियो सामने आने के बाद विवाद शुरू हुआ। तीर्थपुरोहितों और धार्मिक संगठनों ने कार्यक्रम के स्वरूप पर आपत्ति जताई। चमोली जिला प्रशासन ने भी बिना अनुमति सांस्कृतिक कार्यक्रम और तेज आवाज वाले साउंड सिस्टम के इस्तेमाल को लेकर सेना के अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगा है।
बदरीनाथ में शंख न बजाने की परंपरा के पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर वैज्ञानिक कारणों की भी चर्चा होती रही है। कुछ स्रोतों में हिमालयी क्षेत्र में शंख की ध्वनि से बर्फीली चट्टानों और हिमस्खलन के संभावित जोखिम की बात कही गई है, हालांकि इसे वैज्ञानिक रूप से स्थापित निष्कर्ष के बजाय प्रचलित व्याख्या के रूप में देखना उचित है।
वहीं उत्तराखंड के पर्यटन एवं धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज ने कहा है कि बदरीनाथ में संगीत या सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है और कपाट खुलने के अवसर पर सैन्य बैंड की प्रस्तुति भी होती है। शंख को लेकर उनके बयान पर चारधाम तीर्थपुरोहित महापंचायत ने आपत्ति जताई है।
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