
भारत की विदेश नीति हमेशा से “संतुलन” और “स्वतंत्रता” की मिसाल रही है। रूस और अमेरिका, दोनों ही देश भारत के लिए रणनीतिक साझेदार हैं। हाल ही में अमेरिकी सीनेटर ने बयान दिया कि भारत रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से करीबी संबंधों की “कीमत चुका रहा है” और इसी वजह से अमेरिका भारत पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की तैयारी में है। इस टिप्पणी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी है। लेकिन भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने इसका करारा जवाब देते हुए साफ कहा कि भारत किसी दबाव में अपनी विदेश नीति नहीं चलाएगा और हमेशा राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देगा।
भारत और रूस के रिश्ते दशकों पुराने हैं। रक्षा, ऊर्जा और तकनीक के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच गहरे संबंध रहे हैं। वहीं, अमेरिका के साथ भी भारत के संबंध पिछले एक दशक में बेहद मजबूत हुए हैं। QUAD से लेकर व्यापार और रक्षा साझेदारी तक, दोनों देशों के बीच सहयोग का स्तर लगातार बढ़ा है। ऐसे में अमेरिकी सीनेटर का यह बयान कि भारत “पुतिन से दोस्ती की कीमत चुका रहा है”, केवल राजनीतिक दबाव बनाने का प्रयास माना जा रहा है।
विदेश मंत्री जयशंकर ने साफ शब्दों में कहा कि भारत कोई “किराए का साझेदार” नहीं है। भारत अपनी नीतियां खुद तय करता है और दुनिया के साथ “बराबरी के आधार पर” रिश्ते रखता है। उन्होंने यह भी दोहराया कि भारत का रुख हमेशा “बहुध्रुवीय विश्व” के पक्ष में रहा है, जहां कोई भी देश दूसरे पर अपनी शर्तें नहीं थोप सकता।
अमेरिका द्वारा 50 प्रतिशत टैरिफ की धमकी भारत के लिए एक गंभीर आर्थिक चुनौती हो सकती है, लेकिन भारत ने हमेशा वैकल्पिक रास्ते तलाशने में अपनी क्षमता दिखाई है। रूस से सस्ती ऊर्जा खरीदने का फैसला भी भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए किया था, जबकि पश्चिमी देशों ने इसका विरोध किया था। इसके बावजूद भारत ने अंतरराष्ट्रीय दबाव को नज़रअंदाज करते हुए अपने नागरिकों और उद्योगों के लिए किफायती ऊर्जा सुनिश्चित की।
आज भारत न केवल दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, बल्कि जी-20 और ब्रिक्स जैसे मंचों पर अहम भूमिका निभा रहा है। ऐसे में अमेरिका जैसे देशों का दबाव कामयाब होना मुश्किल है। जयशंकर का जवाब भारत की “स्वतंत्र विदेश नीति” का परिचायक है, जो न केवल भारतीय हितों की रक्षा करती है बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को और मजबूत करती है।
कुल मिलाकर, यह पूरा विवाद दिखाता है कि भारत अब किसी भी महाशक्ति की शर्तों पर नहीं, बल्कि अपने आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी रुख पर काम कर रहा है। चाहे पुतिन से दोस्ती हो या अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी, भारत अब पूरी दुनिया को यह संदेश दे रहा है कि वह “दोस्ती करेगा तो बराबरी पर और दुश्मनी का जवाब भी डटकर देगा।”



