BRICS (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) आज एक ऐसा समूह बन चुका है जो न सिर्फ उभरती अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करता है, बल्कि दुनिया की आधी आबादी की आवाज़ भी बन गया है। वहीं दूसरी ओर, 50 साल पुराना G7, जो कभी वैश्विक नीतियों का निर्धारक था, अब उसकी प्रासंगिकता पर सवाल उठने लगे हैं।
BRICS देशों की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, ऊर्जा संसाधनों पर पकड़ और विकासशील देशों के हितों की पैरवी ने उसे वैश्विक राजनीति में एक नया स्थान दिलाया है। वहीं G7, जो विकसित देशों का समूह है, अब विकासशील देशों की अपेक्षाओं को पूरी तरह नहीं समझ पा रहा।
🔸 G7 की चुनौती क्या है?
G7 देशों की संख्या कम है, और वे अक्सर अपने हितों को प्राथमिकता देते हैं। ऐसे में आज की बदलती बहुपक्षीय दुनिया में यह मंच सीमित दिखता है। दूसरी ओर, BRICS अपने नेटवर्क को नए सदस्य देशों तक बढ़ाकर खुद को और प्रभावशाली बना रहा है।
🔸 BRICS की ताकत:
-
वैश्विक GDP का 30%
-
दुनिया की 50% आबादी
-
ऊर्जा, तकनीक और व्यापार में बढ़ती हिस्सेदारी
-
नॉन-वेस्टर्न वर्ल्ड की मजबूत आवाज़
✅ अंत में:
दुनिया के शक्ति संतुलन में BRICS अब एक अहम स्तंभ बन चुका है। जबकि G7 को अपनी भूमिका को दोबारा परिभाषित करने की जरूरत है ताकि वह बदलती वैश्विक जरूरतों के साथ खुद को प्रासंगिक बनाए रख सके।



