
एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच चीन और अमेरिका के बीच रक्षा रणनीतियों को लेकर टकराव तेज़ हो गया है। चीन ने अमेरिका से जापान की धरती पर तैनात टाइफून मिसाइल सिस्टम को हटाने की सख्त मांग की है। चीन का कहना है कि इस मिसाइल सिस्टम से इलाके की सुरक्षा संतुलन बिगड़ रहा है और सीधे तौर पर उसकी संप्रभुता व सुरक्षा को चुनौती मिल रही है। बीजिंग ने चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि अमेरिका और जापान ने इस पर गंभीरता से विचार नहीं किया तो चीन अपनी जवाबी रणनीति के तहत 2000 किलोमीटर तक मारक क्षमता वाली आधुनिक मिसाइलों की तैनाती करेगा।
दरअसल, अमेरिका और जापान के बीच रक्षा सहयोग लंबे समय से चलता आ रहा है। चीन को आशंका है कि टाइफून मिसाइल सिस्टम का उद्देश्य केवल जापान की सुरक्षा नहीं बल्कि चीन के प्रभाव को सीमित करना भी है। चीन का मानना है कि इस तरह के कदम एशिया-प्रशांत क्षेत्र को स्थिर करने की बजाय और अधिक अस्थिर बना रहे हैं। यही कारण है कि चीन बार-बार अमेरिका से अपने सैन्य कदमों पर पुनर्विचार करने की अपील कर रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र पहले ही भू-राजनीतिक तनाव का केंद्र बन चुका है। दक्षिण चीन सागर, ताइवान और जापान को लेकर चीन और अमेरिका आमने-सामने खड़े हैं। अब यदि जापान में टाइफून मिसाइल सिस्टम कायम रहता है तो यह चीन को अपनी सामरिक ताकत बढ़ाने की ओर धकेल देगा। यही कारण है कि चीन ने 2000 किलोमीटर मारक क्षमता वाली मिसाइलों की तैनाती की बात कही है, जो न केवल जापान बल्कि अमेरिका के अन्य सैन्य ठिकानों को भी निशाने पर ले सकती हैं।
भारत समेत एशिया के कई देश इस स्थिति पर नज़र बनाए हुए हैं क्योंकि क्षेत्र में स्थिरता सीधे तौर पर व्यापार और सुरक्षा से जुड़ी है। यदि चीन और अमेरिका के बीच यह टकराव और बढ़ा तो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में हथियारों की होड़ और तेज़ हो सकती है। इससे क्षेत्रीय शांति और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा।
कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि अमेरिका और जापान को इस मसले पर लचीला रवैया अपनाना चाहिए और चीन के साथ बातचीत के जरिए रास्ता निकालना चाहिए। दूसरी ओर, चीन को भी आक्रामक बयानबाज़ी से बचना होगा ताकि सैन्य तनाव युद्ध जैसी स्थिति में न बदल जाए। अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी यही चाहता है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन कायम रहे और कोई भी देश सुरक्षा संकट की ओर न धकेला जाए।
इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि आने वाले समय में एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा और गहरी होगी। यह संघर्ष केवल रक्षा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और कूटनीति पर भी देखने को मिलेगा। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समाज की भूमिका बेहद अहम होगी कि वह तनाव को कम करने में किस तरह योगदान देता है।



