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टाटा ट्रस्ट में ट्रस्टियों के बीच बढ़ा विवाद | शापूरजी मिस्त्री ने दोहराई टाटा संस की लिस्टिंग की मांग

टाटा ट्रस्ट के भीतर एक बार फिर अंदरूनी कलह सामने आई है। ट्रस्ट के प्रमुख ट्रस्टियों के बीच मतभेद गहराने की खबरें हैं, जिनका सीधा असर टाटा समूह के भविष्य पर पड़ सकता है। दरअसल, उद्योगपति शापूरजी मिस्त्री ने एक बार फिर टाटा संस की लिस्टिंग (IPO) की मांग को दोहराया है, जिससे ट्रस्ट के भीतर असहमति का माहौल बन गया है। मिस्त्री का कहना है कि टाटा संस जैसी विशाल कंपनी की पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखने के लिए इसका स्टॉक मार्केट में लिस्ट होना बेहद जरूरी है।

जानकारी के अनुसार, टाटा ट्रस्ट के कई ट्रस्टियों के बीच इस मुद्दे को लेकर मतभेद हैं। कुछ ट्रस्टी जहां लिस्टिंग को समूह की पारदर्शिता और कॉर्पोरेट गवर्नेंस के लिए जरूरी मानते हैं, वहीं कुछ का कहना है कि टाटा संस की लिस्टिंग से समूह की निजी और रणनीतिक स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है। यही टकराव अब ट्रस्ट के भीतर गहराता जा रहा है।

शापूरजी मिस्त्री ने अपने बयान में यह भी कहा कि टाटा संस का आकार और उसकी कंपनियों का बाजार में प्रभाव इतना बड़ा है कि पारदर्शिता अनिवार्य हो जाती है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि समूह के हित में शेयरहोल्डर्स को भी ज्यादा भूमिका दी जानी चाहिए। वहीं दूसरी ओर, टाटा ट्रस्ट के एक धड़े का मानना है कि टाटा संस की निजी संरचना ही उसकी सफलता की असली वजह रही है और लिस्टिंग से यह संतुलन बिगड़ सकता है।

गौरतलब है कि टाटा ट्रस्ट, टाटा संस में बहुमत हिस्सेदारी रखता है और कंपनी के सभी बड़े फैसलों पर इसका सीधा नियंत्रण रहता है। ऐसे में ट्रस्टियों के बीच बढ़ता यह मतभेद समूह की दिशा तय करने में बड़ा मुद्दा बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह विवाद आगे बढ़ा तो इसका असर न केवल टाटा ग्रुप की कंपनियों पर बल्कि भारतीय कॉर्पोरेट सेक्टर की छवि पर भी पड़ सकता है।

कुल मिलाकर, टाटा ट्रस्ट के भीतर मिस्त्री की इस मांग ने एक बार फिर पुराना विवाद जगा दिया है और अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि रतन टाटा और अन्य वरिष्ठ ट्रस्टी इस मतभेद को कैसे सुलझाते हैं।

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