गोमती पुस्तक महोत्सव का आठवां दिन: दास्तानगोई, कव्वाली और पुस्तक विमोचन से सजा सांस्कृतिक उत्सव

गोमती पुस्तक महोत्सव का आठवां दिन साहित्य और संस्कृति की अनोखी झलकियों से भरा रहा। इस दिन के आयोजन ने दर्शकों और साहित्यप्रेमियों को न सिर्फ पुस्तक जगत की नई कृतियों से परिचित कराया बल्कि उन्हें दास्तानगोई और कव्वाली जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी अद्भुत अनुभव दिया। महोत्सव स्थल पर सुबह से ही पाठकों और दर्शकों की भीड़ उमड़ने लगी थी। हर कोई ज्ञान, कला और संगीत की इस अद्भुत संगम का हिस्सा बनने को उत्सुक था।
कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक अंदाज में हुई, जहां दास्तानगोई कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति से श्रोताओं को बीते समय की गलियों में पहुंचा दिया। कहानी कहने की यह पुरानी शैली, जो अब दुर्लभ होती जा रही है, ने उपस्थित सभी को मोह लिया। दास्तानगोई की प्रस्तुति ने यह साबित किया कि मौखिक परंपराएं आज भी लोगों के दिलों में गहरी छाप छोड़ सकती हैं।
इसके बाद मंच पर कव्वाली की बारी आई। सूफी अंदाज में प्रस्तुत इस कव्वाली ने महोत्सव को आध्यात्मिक और भावनात्मक ऊंचाई पर पहुंचा दिया। तालियों की गड़गड़ाहट और ‘वाह-वाह’ की आवाजों से पूरा सभागार गूंज उठा। कव्वाली ने न सिर्फ संगीत प्रेमियों को आनंदित किया बल्कि साहित्यप्रेमियों को भी इस कला के भीतर छिपे साहित्यिक सौंदर्य से परिचित कराया।
आठवें दिन का सबसे खास आकर्षण पुस्तक विमोचन रहा। नए लेखकों और चर्चित साहित्यकारों की कृतियों का लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर लेखकों ने अपनी-अपनी पुस्तकों के बारे में विचार साझा किए और पाठकों से सीधा संवाद भी किया। इसने साहित्य और पाठक के बीच एक जीवंत पुल का निर्माण किया। नई पुस्तकों के विमोचन ने युवा पाठकों में उत्साह जगाया और साहित्यिक विमर्श को नई दिशा दी।
गोमती पुस्तक महोत्सव का यह दिन इस बात का साक्षी बना कि साहित्य और संस्कृति जब एक मंच पर आते हैं तो समाज को न केवल नई दृष्टि मिलती है बल्कि लोगों के दिलों को जोड़ने का काम भी होता है। दास्तानगोई, कव्वाली और पुस्तक विमोचन ने इस दिन को यादगार बना दिया और उपस्थित दर्शकों को ऐसी स्मृतियां दीं जिन्हें वे लंबे समय तक संजोकर रखेंगे।



