
वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के मंच पर भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच प्रस्तावित ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ को लेकर हलचल तेज हो गई है। इस ऐतिहासिक व्यापार समझौते को भारत-EU मुक्त व्यापार समझौता (FTA) भी कहा जा रहा है, जो दोनों पक्षों के लिए रणनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक दृष्टि से बेहद अहम माना जा रहा है। लेकिन इस डील ने अमेरिका की भौंहें तान दी हैं। अमेरिकी विश्लेषकों और नीति निर्माताओं का मानना है कि यूरोप एक तरह से अपने ही खिलाफ जंग को फाइनेंस कर रहा है, क्योंकि भारत के साथ इतनी बड़ी डील यूरोप को अमेरिकी प्रभाव से धीरे-धीरे दूर कर सकती है। अमेरिका को डर है कि भारत-EU की यह साझेदारी वैश्विक सप्लाई चेन, टेक्नोलॉजी, डिफेंस, ग्रीन एनर्जी और डिजिटल इकोनॉमी में एक नया पावर सेंटर खड़ा कर देगी, जिससे वाशिंगटन की रणनीतिक बढ़त को चुनौती मिलेगी। भारत के लिए यह समझौता इसलिए भी खास है क्योंकि इससे भारतीय निर्यात को यूरोपीय बाजारों में बेहतर पहुंच मिलेगी, निवेश बढ़ेगा और ‘मेक इन इंडिया’ को नई रफ्तार मिलेगी। वहीं यूरोप, रूस-यूक्रेन युद्ध और ऊर्जा संकट के बाद, एशिया में एक भरोसेमंद और स्थिर साझेदार की तलाश में है, और भारत इस भूमिका में बिल्कुल फिट बैठता है। अमेरिका की चिढ़ की एक बड़ी वजह यह भी है कि यूरोप पहले से ही रूस से ऊर्जा खरीद, चीन के साथ व्यापार और अब भारत के साथ मेगा डील के जरिए एक स्वतंत्र वैश्विक नीति की ओर बढ़ता दिख रहा है। इससे ट्रांसअटलांटिक एकजुटता पर सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह डील सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था (Multipolar World Order) को और मजबूत करेगी, जहां भारत एक केंद्रीय भूमिका निभाएगा। कुल मिलाकर, भारत-EU की ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ न केवल आर्थिक नक्शा बदल सकती है, बल्कि वैश्विक राजनीति में शक्ति संतुलन को भी नई दिशा दे सकती है—और यही बात अमेरिका को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है।



