
लंदन में आयोजित टॉमी रॉबिन्सन की विवादास्पद रैली ने एक बार फिर यूरोप की राजनीति और समाज में तनाव को उजागर कर दिया। इस रैली का नारा था “लड़ो या मरो”, जिसने माहौल को और उग्र बना दिया। खास बात यह रही कि इस बार रॉबिन्सन को अप्रत्याशित रूप से एलन मस्क का समर्थन भी मिला, जिससे रैली की चर्चा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैल गई। जैसे ही भीड़ ने इकट्ठा होकर अपने नारों और भाषणों से माहौल को गर्माया, प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव शुरू हो गया। कई प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर लात-घूंसे बरसाए, जिससे हालात बिगड़ते चले गए और पुलिस को भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त बल बुलाना पड़ा।
टॉमी रॉबिन्सन, जिन्हें ब्रिटेन में चरमपंथ और विवादास्पद विचारों के लिए जाना जाता है, लंबे समय से अपने समर्थकों के बीच ‘राष्ट्रवाद’ और ‘सांस्कृतिक पहचान’ को बचाने के मुद्दों को लेकर अभियान चलाते रहे हैं। उनकी रैलियों को हमेशा से हिंसा और विरोध के लिए जाना जाता है। इस बार जब एलन मस्क जैसे वैश्विक उद्योगपति ने सोशल मीडिया पर अप्रत्यक्ष रूप से रॉबिन्सन के समर्थन में बयान दिया, तो यह रैली और ज्यादा सुर्खियों में आ गई। कई विश्लेषकों का मानना है कि मस्क का यह समर्थन यूरोप की राजनीति में दक्षिणपंथी विचारों को बढ़ावा देने वाली ताकतों के लिए हौसला बढ़ाने जैसा है।
रैली के दौरान माहौल इतना तनावपूर्ण हो गया कि पुलिस को सुरक्षा कारणों से कई मार्गों को बंद करना पड़ा। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर जमकर प्रहार किया, जिससे कई सुरक्षाकर्मी घायल हो गए। वहीं, पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए बल प्रयोग करना पड़ा। सोशल मीडिया पर इस झड़प के कई वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिनमें पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच संघर्ष साफ देखा जा सकता है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना यूरोप में बढ़ती असहिष्णुता और विभाजनकारी राजनीति का बड़ा उदाहरण है। जहां एक ओर टॉमी रॉबिन्सन के समर्थक इसे ‘स्वतंत्रता की लड़ाई’ बताते हैं, वहीं दूसरी ओर विपक्षी दल और मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे लोकतंत्र और सामाजिक शांति के लिए खतरा मान रहे हैं। एलन मस्क का इस रैली के साथ नाम जुड़ना भी कई सवाल खड़े कर रहा है कि क्या तकनीकी और व्यावसायिक दिग्गज अब राजनीतिक ध्रुवीकरण को भी प्रभावित करने लगे हैं।
कुल मिलाकर, “लड़ो या मरो” की यह रैली केवल ब्रिटेन ही नहीं बल्कि पूरे यूरोप के लिए एक चेतावनी है कि यदि समय रहते संवाद और समझदारी से काम नहीं लिया गया, तो समाज में विभाजन और हिंसा की घटनाएं और तेज़ हो सकती हैं।



