
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) ने हाल ही में एक बड़ा बयान देते हुए कहा कि ट्रम्प और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच की दोस्ती अब अतीत की बात हो चुकी है। उनके अनुसार, इस रिश्ते की कमजोर होती कड़ी ने न केवल व्यक्तिगत स्तर पर बल्कि अमेरिका-भारत संबंधों पर भी गहरा असर डाला है। उन्होंने यह भी दावा किया कि व्हाइट हाउस की नीतियों ने दोनों देशों के बीच दशकों से बने भरोसे को पीछे धकेल दिया है, जिसे सुधारना अब बेहद कठिन कार्य होगा।
अमेरिका और भारत पिछले कुछ वर्षों में रक्षा, तकनीक, व्यापार और रणनीतिक साझेदारी के क्षेत्र में एक-दूसरे के लिए बेहद अहम सहयोगी बनकर उभरे थे। मोदी और ट्रम्प के बीच बनी नजदीकियों ने इस रिश्ते को और मजबूती दी थी। ‘हाउडी मोदी’ जैसे कार्यक्रमों से लेकर वैश्विक मंचों तक दोनों नेताओं ने मिलकर साझा रणनीतियों पर काम किया। लेकिन हाल के वर्षों में राजनीतिक परिस्थितियों, बदलती नीतियों और आपसी मतभेदों ने इस रिश्ते को ठंडा कर दिया है।
पूर्व NSA का मानना है कि व्हाइट हाउस की हालिया विदेश नीति ने भारत के साथ सामरिक और आर्थिक साझेदारी को नुकसान पहुंचाया है। कई अहम समझौते या तो ठंडे बस्ते में चले गए हैं या फिर उनमें प्रगति की रफ्तार काफी धीमी हो गई है। इससे दोनों देशों के बीच विश्वास का स्तर कमजोर हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि नई पीढ़ी की कूटनीति को अब अतिरिक्त मेहनत करनी होगी ताकि रिश्तों में आए इस ठहराव को दूर किया जा सके।
अमेरिका-भारत संबंधों में आई इस खटास के कई कारण बताए जा रहे हैं। एक तरफ जहां व्यापारिक मुद्दों और शुल्क विवाद ने तनाव बढ़ाया, वहीं दूसरी तरफ वैश्विक राजनीति में चीन और रूस के प्रति अलग-अलग रुख ने भी दूरी पैदा की। भारत की ‘स्वायत्त विदेश नीति’ को लेकर भी अमेरिकी हलकों में असहमति जताई जाती रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और भारत दोनों ही बड़े लोकतांत्रिक देश हैं और वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए एक-दूसरे के सहयोग की आवश्यकता है। चाहे वह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई हो, इंडो-पैसिफिक में सुरक्षा का मुद्दा हो या फिर तकनीक और ऊर्जा सहयोग—इन सभी क्षेत्रों में साझेदारी दोनों देशों के लिए लाभकारी है। ऐसे में रिश्तों में आई गिरावट को दूर करना समय की मांग है।
अंततः, पूर्व अमेरिकी NSA का यह बयान केवल चेतावनी ही नहीं बल्कि भविष्य की दिशा भी दर्शाता है। यदि अमेरिका और भारत अपने पुराने भरोसे और सहयोग की राह पर नहीं लौटे, तो इससे वैश्विक राजनीति में असंतुलन पैदा हो सकता है। आने वाले समय में दोनों देशों की सरकारों के लिए यह चुनौती होगी कि वे आपसी मतभेदों को भुलाकर नए सिरे से रिश्तों को मजबूत करें।



