
अमेरिका में H-1B वीजा को लेकर चल रही सख्ती अब खुद वहां की अर्थव्यवस्था और टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री पर भारी पड़ने लगी है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कार्यकाल में “अमेरिका फर्स्ट” पॉलिसी के तहत वीजा नियमों को कड़ा किया था, ताकि अमेरिकी कंपनियां विदेशी कर्मचारियों की जगह अमेरिकी नागरिकों को नौकरी दें। लेकिन अब उसी नीति का उल्टा असर दिखने लगा है।
ट्रंप प्रशासन ने H-1B वीजा शुल्क में भारी बढ़ोतरी की थी और इसके आवेदन प्रक्रिया को जटिल बना दिया था। इसका सीधा प्रभाव भारतीय आईटी कंपनियों और टेक सेक्टर के प्रोफेशनल्स पर पड़ा। भारत से हर साल हजारों इंजीनियर, डेवलपर और टेक एक्सपर्ट H-1B वीजा के जरिए अमेरिका जाते थे, जिससे वहां की कंपनियों को किफायती और उच्च गुणवत्ता वाला वर्कफोर्स मिलता था। लेकिन कड़े नियमों और बढ़े शुल्क के कारण अब कंपनियों को योग्य कर्मचारियों की भारी कमी झेलनी पड़ रही है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी टेक सेक्टर में लगभग 30% तक वर्कफोर्स की कमी हो गई है। खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिक्योरिटी और क्लाउड इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में स्किल्ड कर्मचारियों की भारी डिमांड है। पहले ये कमी भारतीय और एशियाई प्रोफेशनल्स पूरा करते थे, लेकिन अब वीजा प्रतिबंधों की वजह से भर्ती की प्रक्रिया धीमी पड़ गई है।
अमेरिकी कंपनियों ने अब सार्वजनिक रूप से वीजा शुल्क और पॉलिसियों में बदलाव की मांग की है। उनका कहना है कि अगर सरकार H-1B प्रोग्राम को लचीला नहीं बनाएगी तो अमेरिका टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अपनी प्रतिस्पर्धा खो सकता है। कई कंपनियां अब भारत, कनाडा और सिंगापुर जैसे देशों में अपने ऑफशोर ऑफिस बढ़ा रही हैं ताकि उन्हें टैलेंट की कमी न झेलनी पड़े।
विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन द्वारा लिया गया यह निर्णय “दोधारी तलवार” साबित हो रहा है। जहां एक ओर अमेरिकी सरकार को लगता था कि इससे स्थानीय रोजगार बढ़ेगा, वहीं दूसरी ओर उच्च कौशल वाले कर्मचारियों की कमी से उत्पादकता और नवाचार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
भारत के दृष्टिकोण से देखा जाए तो H-1B वीजा में आई रुकावट ने भारतीय आईटी उद्योग को नई दिशा दी है। अब कंपनियां अमेरिका में शाखाएं खोलने के बजाय भारत में ही ग्लोबल डिलीवरी सेंटर्स विकसित कर रही हैं। इस बदलाव से भारत की टेक इंडस्ट्री और भी सशक्त हो रही है।
कुल मिलाकर, ट्रंप की वीजा नीति का असर अब उल्टा पड़ गया है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था जहां विदेशी प्रतिभा पर निर्भर थी, वहीं अब उसी पर लगाए गए प्रतिबंध उसके लिए चुनौती बन रहे हैं। आने वाले समय में अमेरिका की नई सरकार को यह तय करना होगा कि वह ग्लोबल टैलेंट को आकर्षित करने के लिए अपने वीजा सिस्टम को फिर से कैसे संतुलित करती है।



