
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के वरिष्ठ अधिकारी जल्द ही ईरान के दौरे पर जाने वाले हैं, लेकिन इस यात्रा के दौरान उन्हें ईरान के प्रमुख परमाणु स्थलों का निरीक्षण करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यह निर्णय वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय बन गया है, क्योंकि पहले से ही ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर संदेह और विवाद जारी हैं। IAEA का उद्देश्य सदस्य देशों में परमाणु गतिविधियों की निगरानी करना और यह सुनिश्चित करना है कि उनका इस्तेमाल केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए हो, लेकिन ईरान का यह रवैया कई सवाल खड़े कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान का यह कदम अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ उसके तनावपूर्ण संबंधों का परिणाम हो सकता है। 2015 के ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) के बाद ईरान पर लगे कई आर्थिक प्रतिबंध हटाए गए थे, लेकिन 2018 में अमेरिका के समझौते से बाहर निकलने और पुनः प्रतिबंध लगाने के बाद हालात फिर बिगड़ गए। तब से ईरान ने अपने यूरेनियम संवर्धन स्तर को बढ़ा दिया है, जो केवल ऊर्जा उत्पादन के लिए आवश्यक स्तर से कहीं अधिक है। यही कारण है कि पश्चिमी देशों को आशंका है कि ईरान गुपचुप तरीके से परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में काम कर रहा हो सकता है।
IAEA अधिकारियों को परमाणु स्थलों पर जाने की अनुमति न देना यह संकेत देता है कि ईरान किसी संवेदनशील गतिविधि को छिपाने की कोशिश कर रहा हो सकता है। हालांकि, तेहरान का दावा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण है और यह केवल चिकित्सा, ऊर्जा और वैज्ञानिक शोध के लिए है। ईरान यह भी कहता है कि वह अंतरराष्ट्रीय कानून और परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के तहत अपने दायित्वों का पालन कर रहा है।
कूटनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है कि ईरान इस रणनीति का इस्तेमाल पश्चिमी देशों पर दबाव बनाने के लिए कर रहा है, ताकि उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को हटाया जा सके। वहीं, IAEA इस बात पर जोर देता है कि पारदर्शिता के बिना परमाणु कार्यक्रमों की विश्वसनीयता पर भरोसा करना मुश्किल है। यदि ईरान अपने परमाणु स्थलों तक पहुंच नहीं देगा, तो यह अंतरराष्ट्रीय समुदाय में उसकी छवि को और नुकसान पहुंचा सकता है।
पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी ने बार-बार चेतावनी दी है कि यदि ईरान ने पारदर्शी रवैया नहीं अपनाया, तो उसके खिलाफ कड़े कदम उठाए जा सकते हैं। वहीं, रूस और चीन जैसे देश ईरान के साथ अपने संबंध मजबूत बनाए रखने के पक्ष में हैं और उनका मानना है कि संवाद और कूटनीति ही इस समस्या का समाधान है।
आगामी वार्ता में यह देखना दिलचस्प होगा कि IAEA अधिकारी और ईरान के नेता किस प्रकार के समझौते पर पहुंचते हैं। क्या ईरान अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण के लिए अपने दरवाजे खोलेगा, या फिर अपनी मौजूदा नीति पर कायम रहेगा? इस सवाल का जवाब आने वाले दिनों में तय करेगा कि मध्य-पूर्व में तनाव कम होगा या और बढ़ेगा।



