
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने हाल ही में एक कार्यक्रम में बीजेपी अध्यक्ष चुनाव और अमेरिकी राजनीति से जुड़े मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अगर वास्तव में बीजेपी की कमान आरएसएस के हाथ में होती, तो आज हालात बिल्कुल अलग होते। उनका यह बयान न सिर्फ राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना बल्कि इससे एक बार फिर बीजेपी और आरएसएस के रिश्तों को लेकर बहस तेज हो गई है।
मोहन भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ का काम संगठन और समाज को दिशा देना है, न कि राजनीतिक दलों के भीतर अध्यक्ष चुनाव में दखल देना। उन्होंने कहा कि बीजेपी एक स्वतंत्र राजनीतिक पार्टी है, जिसके अपने नियम और प्रक्रियाएं हैं। संघ केवल वैचारिक प्रेरणा देता है और मार्गदर्शन करता है। इस बयान से यह भी संकेत मिला कि संघ राजनीति में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं होना चाहता, बल्कि वह अपने मूल उद्देश्य—समाज निर्माण और राष्ट्रहित की सेवा—पर ही केंद्रित रहना चाहता है।
दिलचस्प बात यह रही कि मोहन भागवत ने अमेरिकी राजनीति और पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि विश्व राजनीति में जो उतार-चढ़ाव दिख रहे हैं, वे इस बात का संकेत हैं कि लोकतंत्र में जनता का विश्वास सबसे महत्वपूर्ण है। चाहे ट्रंप हों या कोई और नेता, यदि वे जनता की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरते तो उनकी लोकप्रियता घट जाती है। उनका यह बयान वैश्विक लोकतंत्र के लिए एक बड़ा संदेश माना जा रहा है।
बीजेपी अध्यक्ष चुनाव पर भागवत का बयान राजनीतिक दृष्टि से अहम है। बीते कुछ समय से विपक्ष लगातार यह आरोप लगाता रहा है कि बीजेपी की हर गतिविधि पर संघ का प्रभाव रहता है। लेकिन भागवत के शब्दों से यह स्पष्ट हो गया कि बीजेपी और आरएसएस के बीच वैचारिक तालमेल जरूर है, लेकिन राजनीतिक निर्णय बीजेपी अपने स्तर पर ही लेती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भागवत का यह बयान 2025 के सियासी परिदृश्य को देखते हुए बेहद महत्वपूर्ण है। इससे यह भी संदेश गया कि संघ अपने कार्यक्षेत्र को लेकर सजग है और वह बीजेपी के संगठनात्मक फैसलों में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करने से बचता है। वहीं, ट्रंप पर उनकी टिप्पणी ने यह जता दिया कि संघ प्रमुख विश्व राजनीति पर भी नजर रखते हैं और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के पक्षधर हैं।
कुल मिलाकर, मोहन भागवत का यह वक्तव्य एक तरफ भारतीय राजनीति में संघ की भूमिका को लेकर उठते सवालों का जवाब देता है, वहीं दूसरी तरफ वैश्विक लोकतंत्र की मजबूती पर भी रोशनी डालता है। यह बयान आने वाले समय में बीजेपी, संघ और विपक्षी दलों के बीच बहस का बड़ा मुद्दा बनने वाला है।



