पाकिस्तान हाल ही में एक अंतरराष्ट्रीय अदालत के फैसले पर खुशियां मना रहा था, मानो उसने किसी बड़े कूटनीतिक युद्ध में जीत हासिल कर ली हो। लेकिन असलियत यह है कि जिस अदालत के फैसले का वह प्रचार कर रहा है, भारत उस अदालत को आधिकारिक मान्यता ही नहीं देता। यह मामला न केवल कूटनीतिक दृष्टि से दिलचस्प है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कैसे पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों का इस्तेमाल अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए करता है।
मामला दरअसल एक तथाकथित “अंतरराष्ट्रीय न्यायिक मंच” से जुड़ा है, जिसे पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ एक सुनवाई के लिए चुना। यह मंच न तो संयुक्त राष्ट्र का हिस्सा है, न ही इसके फैसलों का कोई कानूनी बाध्यकारी प्रभाव होता है। अंतरराष्ट्रीय कानून में कई ऐसे निजी या अर्ध-निजी मंच होते हैं, जहां पक्षकार सहमति से जा सकते हैं, लेकिन यदि कोई देश इसकी सदस्यता या अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं करता, तो उसके खिलाफ दिया गया फैसला केवल प्रतीकात्मक ही होता है।
भारत ने साफ कहा है कि वह इस अदालत के अधिकार क्षेत्र को मान्यता नहीं देता, इसलिए इस फैसले का कोई कानूनी असर उस पर नहीं होगा। भारत का यह भी कहना है कि पाकिस्तान बार-बार ऐसे मंचों का सहारा लेकर दुनिया में भ्रम फैलाने की कोशिश करता है, ताकि घरेलू राजनीति में अपने नागरिकों को यह दिखा सके कि वह भारत के खिलाफ कोई बड़ी जीत हासिल कर रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक पाकिस्तान का यह रवैया नया नहीं है। वह पहले भी अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) और अन्य मंचों पर भारत के खिलाफ मामले लेकर गया है, जिनमें से कई बार उसे निराशा हाथ लगी। उदाहरण के लिए, कुलभूषण जाधव मामले में भी पाकिस्तान को ICJ में आंशिक झटका लगा था, जब अदालत ने भारत की मांगों को आंशिक रूप से स्वीकार किया।
भारत की विदेश नीति का रुख हमेशा स्पष्ट रहा है – केवल उन्हीं अंतरराष्ट्रीय मंचों के फैसलों को मान्यता दी जाएगी, जिनकी सदस्यता और अधिकार क्षेत्र को भारत ने औपचारिक रूप से स्वीकार किया हो। इस नीति का उद्देश्य भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना है।
पाकिस्तान के लिए यह एक राजनीतिक हथियार जैसा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के खिलाफ कोई भी बयान या कथित फैसला मिलते ही वह उसे अपने मीडिया में खूब उछालता है, ताकि देश में यह संदेश जाए कि उसकी सरकार कूटनीतिक मोर्चे पर सक्रिय है। लेकिन वास्तविकता में ऐसे अधिकांश फैसलों का कोई कानूनी महत्व नहीं होता।
कुल मिलाकर, यह मामला एक बार फिर साबित करता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रतीकात्मक जीत और वास्तविक कानूनी जीत में जमीन-आसमान का फर्क होता है। भारत के लिए सबसे अहम है अपनी संप्रभुता की रक्षा और तथ्यों पर आधारित कूटनीति, जबकि पाकिस्तान फिलहाल प्रचार की राजनीति में व्यस्त है।



