
आज की बदलती अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत एक ऐसी शक्ति के रूप में उभर रहा है, जिसकी डिप्लोमेसी पूरे विश्व का ध्यान खींच रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने जहां विश्व को दो ध्रुवों में बांट दिया है, वहीं भारत ने तटस्थ रहते हुए दोनों देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे हैं। इसी कड़ी में यह खबर और भी अहम हो जाती है कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की, दोनों भारत का दौरा करने वाले हैं। यह कदम भारत की बढ़ती कूटनीतिक ताकत और वैश्विक प्रभाव का स्पष्ट संकेत है।
पश्चिमी देशों के लिए यह स्थिति चौंकाने वाली है, क्योंकि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में टैरिफ वॉर छेड़कर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं में हलचल मचा दी है। ऐसे समय में जब अमेरिका और यूरोप किसी पक्ष का समर्थन करने पर अड़े हुए हैं, भारत का संतुलित रुख और दोनों नेताओं को अपने यहां आमंत्रित करना, भारत की “वसुधैव कुटुंबकम्” की नीति को दर्शाता है। भारत न केवल आर्थिक रूप से बल्कि कूटनीति के क्षेत्र में भी सुपरपावर बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
पुतिन का भारत के साथ पुराना और गहरा संबंध रहा है। रक्षा सौदे, ऊर्जा सहयोग और रणनीतिक साझेदारी में रूस हमेशा भारत का अहम साथी रहा है। दूसरी ओर, जेलेंस्की का दौरा इस बात का संकेत है कि भारत यूक्रेन के साथ भी अपने रिश्ते मजबूत करना चाहता है। भारत ने हमेशा शांति वार्ता और संघर्ष के समाधान की वकालत की है। यही वजह है कि यूक्रेन भी भारत को एक भरोसेमंद मध्यस्थ और संभावित सहयोगी मानता है।
ट्रंप के टैरिफ वॉर के चलते अमेरिका की नीति में कठोरता देखने को मिल रही है। चीन और अमेरिका के बीच बढ़ती आर्थिक प्रतिस्पर्धा के बीच भारत एक ऐसे विकल्प के रूप में उभर रहा है, जिस पर पूरी दुनिया की नजर है। भारत का यह कदम न केवल उसकी तटस्थता बल्कि उसकी कूटनीतिक चतुराई का भी प्रमाण है।
भारत की यह पहल विश्व मंच पर उसकी छवि को और मजबूत करेगी। यदि पुतिन और जेलेंस्की, दोनों भारत आकर बातचीत के किसी साझा एजेंडे पर सहमत होते हैं, तो यह कदम वैश्विक शांति के लिए ऐतिहासिक साबित हो सकता है। आने वाले समय में भारत की डिप्लोमेसी ही यह तय करेगी कि विश्व राजनीति में शक्ति संतुलन किस दिशा में जाएगा।



