
NATO ने एक बार फिर साफ शब्दों में कहा है कि अमेरिका के बिना यूरोप अपनी रक्षा करने में सक्षम नहीं है। गठबंधन के शीर्ष अधिकारियों के इस बयान ने यूरोपीय राजनीति और सुरक्षा नीति पर नई बहस छेड़ दी है। NATO का मानना है कि यूरोप के कई नेता रणनीतिक स्वायत्तता की बातें तो कर रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है। मौजूदा हालात में यूरोपीय देशों की सैन्य क्षमता, संसाधन और समन्वय इतने मजबूत नहीं हैं कि वे अकेले बड़े सुरक्षा खतरों का सामना कर सकें। यूक्रेन युद्ध के बाद यह बात और स्पष्ट हो गई है कि आधुनिक युद्ध केवल सैनिकों की संख्या से नहीं, बल्कि उन्नत तकनीक, खुफिया तंत्र, एयर डिफेंस और लॉजिस्टिक सपोर्ट से लड़ा जाता है, जिसमें अमेरिका की भूमिका निर्णायक रही है।
NATO अधिकारियों ने यह भी कहा कि अगर यूरोप वास्तव में अमेरिका पर निर्भरता कम करना चाहता है, तो उसे अपने रक्षा बजट में ठोस और निरंतर बढ़ोतरी करनी होगी। कई यूरोपीय देश अब भी GDP का 2 प्रतिशत रक्षा पर खर्च करने के लक्ष्य से काफी पीछे हैं। केवल घोषणाओं और सम्मेलनों से सुरक्षा मजबूत नहीं होती, इसके लिए हथियारों के आधुनिकीकरण, संयुक्त सैन्य अभ्यास और रक्षा उद्योग में निवेश जरूरी है। NATO का तर्क है कि अमेरिका न सिर्फ सैन्य ताकत देता है, बल्कि रणनीतिक नेतृत्व, परमाणु निरोधक क्षमता और वैश्विक स्तर पर सुरक्षा संतुलन बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाता है।
यूरोपीय नेताओं के बीच “रणनीतिक स्वायत्तता” का विचार तेजी से लोकप्रिय हो रहा है, लेकिन NATO ने इसे फिलहाल एक आदर्शवादी सोच बताया है। संगठन का कहना है कि बिना पर्याप्त संसाधनों के अकेले चलने की बात करना केवल सपने देखने जैसा है। रूस, मध्य-पूर्व और साइबर सुरक्षा जैसे खतरों के बीच यूरोप को यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाना होगा।
इस बयान का संदेश साफ है—या तो यूरोप अमेरिका के साथ मिलकर सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करे, या फिर अगर वह स्वतंत्र राह चुनना चाहता है तो रक्षा खर्च, सैन्य तैयारी और राजनीतिक इच्छाशक्ति तीनों में बड़ा बदलाव लाए। NATO के अनुसार, सुरक्षा समझौतों में भावनाओं से ज्यादा महत्व क्षमता और प्रतिबद्धता का होता है, और यही कसौटी आने वाले वर्षों में यूरोप की दिशा तय करेगी।



