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नेपाल की राजनीति: राजशाही से लोकतंत्र तक का सफर और 29 साल का सत्ता संघर्ष

नेपाल दक्षिण एशिया का एक छोटा लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देश है, जिसने बीते तीन दशकों में राजनीतिक अस्थिरता का लंबा दौर देखा है। 1990 से लेकर आज तक नेपाल ने राजशाही से लोकतंत्र और फिर गणतंत्र तक का सफर तय किया, लेकिन इस यात्रा के दौरान सत्ता परिवर्तन और राजनीतिक खींचतान का सिलसिला कभी थमा नहीं। यही वजह है कि नेपाल पिछले 29 सालों से राजनीतिक रूप से सुलगता रहा है।

नेपाल में 1990 का दशक बदलाव की शुरुआत का दौर था। जनता आंदोलन (जनआंदोलन-1) के दबाव में तत्कालीन राजा बीरेन्द्र ने बहुदलीय प्रणाली की बहाली की। यह लोकतंत्र की दिशा में एक बड़ा कदम था, लेकिन जल्द ही राजशाही और राजनीतिक दलों के बीच सत्ता संघर्ष शुरू हो गया। सरकारें बार-बार बदलती रहीं और स्थिरता कायम नहीं हो सकी।

1996 में नेपाल माओवादी विद्रोह ने देश को गहरे संकट में डाल दिया। दस साल तक चले इस सशस्त्र संघर्ष में हजारों लोगों की जान गई और नेपाल गृहयुद्ध की आग में झुलसता रहा। माओवादी आंदोलन का मकसद राजशाही को खत्म कर गणतंत्र की स्थापना करना था। यह संघर्ष 2006 में शांति समझौते के बाद समाप्त हुआ और नेपाल ने एक नए राजनीतिक अध्याय की ओर कदम बढ़ाया।

2001 में नेपाल राजपरिवार हत्याकांड ने देश को झकझोर दिया। राजा बीरेन्द्र और उनके परिवार की हत्या के बाद गद्दी पर राजा ज्ञानेंद्र बैठे, लेकिन उनकी तानाशाही प्रवृत्ति ने जनता को एक बार फिर आंदोलित कर दिया। 2006 के दूसरे जनआंदोलन ने राजशाही की जड़ों को हिला दिया और लोकतंत्र की नई नींव रखी गई।

2008 में नेपाल आधिकारिक रूप से एक धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र बना और राजशाही का अंत हो गया। लेकिन यहां से शुरू हुआ राजनीतिक अस्थिरता का नया अध्याय। माओवादी, कांग्रेस और UML जैसे प्रमुख दल सत्ता की होड़ में लगातार एक-दूसरे से टकराते रहे। नतीजा यह हुआ कि नेपाल में स्थायी सरकार कभी नहीं बन पाई। प्रधानमंत्री बार-बार बदले गए और संसद कई बार भंग करनी पड़ी।

आज भी नेपाल राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है। सत्ता परिवर्तन, दलों के बीच अविश्वास और बार-बार टूटने वाले गठबंधन देश की सबसे बड़ी समस्या हैं। जनता को स्थिर सरकार और विकास की उम्मीदें अब भी अधूरी हैं।

कुल मिलाकर, नेपाल की 29 साल की राजनीतिक यात्रा सत्ता संघर्ष, आंदोलन, विद्रोह और अस्थिरता से भरी रही है। राजशाही से गणतंत्र तक का सफर भले ही पूरा हो गया हो, लेकिन सच्चे लोकतंत्र और राजनीतिक स्थिरता की राह नेपाल के लिए अभी भी लंबी और कठिन है।

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