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लखनऊ में दिव्यांगों से बदसलूकी, पुलिस ने घसीटा

लखनऊ में दिव्यांग जनों के साथ पुलिस द्वारा की गई कथित बदसलूकी ने पूरे प्रदेश में आक्रोश की लहर पैदा कर दी है। यह घटना तब घटी जब दिव्यांग लोग अपनी विभिन्न मांगों को लेकर विधानसभा के सामने शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन कर रहे थे। लेकिन स्थिति उस समय तनावपूर्ण हो गई जब पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को जबरन घसीटते हुए गाड़ियों में बिठाया और उन्हें ईको गार्डन भेज दिया।

प्रदर्शन कर रहे दिव्यांगों का कहना था कि वे वर्षों से पेंशन, नौकरी में आरक्षण, मेडिकल सुविधाएं और अन्य सामाजिक सहायता की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार उनकी समस्याओं को नजरअंदाज कर रही है। “हम भी इंसान हैं, हमें भी जीने का हक है,” एक प्रदर्शनकारी ने रोते हुए कहा। उन्होंने बताया कि जब वे विधानसभा के सामने पहुंचे तो उन्हें वहां से खदेड़ दिया गया और कुछ को घसीटते हुए गाड़ियों में डाल दिया गया।

प्रत्यक्षदर्शियों और कुछ वायरल हो चुके वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि कैसे व्हीलचेयर पर बैठे दिव्यांगों को पुलिसकर्मी जबरन खींचते हुए ले जा रहे हैं। यह दृश्य न केवल शर्मनाक है, बल्कि प्रशासन की संवेदनहीनता को भी उजागर करता है।

पुलिस प्रशासन का कहना है कि प्रदर्शनकारियों ने बिना अनुमति के विधानसभा के सामने विरोध किया, जिससे ट्रैफिक बाधित हुआ और सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हुई। इसलिए उन्हें ईको गार्डन भेजा गया, जो कि सरकार द्वारा निर्धारित धरना स्थल है। हालांकि, सवाल यह है कि क्या विरोध कर रहे दिव्यांगों के साथ ऐसा बर्ताव उचित था?

घटना के बाद राजनीतिक दलों ने भी इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। विपक्ष ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि “जो सरकार दिव्यांगों की बात नहीं सुनती, वह जनता की भलाई के दावे कैसे कर सकती है?” वहीं, सोशल मीडिया पर भी लोगों ने इस कार्रवाई की जमकर निंदा की है और #SupportDisabledRights ट्रेंड करने लगा।

मानवाधिकार संगठनों ने इस पूरे घटनाक्रम की जांच की मांग की है। उनका कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का अधिकार हर नागरिक को है, चाहे वह दिव्यांग हो या सामान्य। अगर कोई अपनी पीड़ा लोकतांत्रिक तरीके से व्यक्त कर रहा है, तो प्रशासन को सुनना चाहिए, न कि दबाना।

इस घटना ने न केवल सरकार की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह भी दिखा दिया है कि दिव्यांग नागरिकों के अधिकार आज भी कितने उपेक्षित हैं। अगर सरकार और समाज दोनों इस पर गंभीरता से ध्यान नहीं देंगे, तो यह सिर्फ एक आंदोलन नहीं, बल्कि एक सामाजिक असंतुलन का रूप ले सकता है।

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