
दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय (IGI) एयरपोर्ट से लंदन यूनिवर्सिटी की एक प्रोफेसर को डिपोर्ट किए जाने की खबर ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। जानकारी के मुताबिक, यह प्रोफेसर भारत एक शैक्षणिक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आई थीं, लेकिन एयरपोर्ट अधिकारियों ने इमिग्रेशन जांच के दौरान उनके दस्तावेजों और वीज़ा शर्तों में गंभीर खामियां पाए जाने पर उन्हें देश में प्रवेश की अनुमति नहीं दी। इसके बाद उन्हें तुरंत डिपोर्ट कर वापस लंदन भेज दिया गया।
सूत्रों के अनुसार, प्रोफेसर का वीज़ा टूरिस्ट श्रेणी का था, जबकि वह भारत में एक विश्वविद्यालय में व्याख्यान देने और अकादमिक गतिविधियों में भाग लेने आई थीं। भारतीय वीज़ा नियमों के तहत टूरिस्ट वीज़ा पर किसी भी प्रकार की प्रोफेशनल या शैक्षणिक गतिविधि करना प्रतिबंधित है। इस कारण इमिग्रेशन विभाग ने इसे वीज़ा शर्तों का उल्लंघन मानते हुए कार्रवाई की। बताया जा रहा है कि प्रोफेसर ने इस संबंध में अपनी ओर से सफाई देने की कोशिश की, लेकिन दस्तावेज़ी प्रमाण न होने के कारण अधिकारियों ने नियमों के तहत डिपोर्टेशन का फैसला लिया।
इस घटना के बाद से सोशल मीडिया पर भी बहस छिड़ गई है। कुछ लोग इस कदम को भारत के सख्त इमिग्रेशन कानूनों का उदाहरण बता रहे हैं, तो कुछ इसे एक ‘अनुचित कार्रवाई’ कह रहे हैं। वहीं, सरकारी सूत्रों का कहना है कि देश के नियम सभी के लिए समान हैं — चाहे वे किसी भी देश या संस्था से क्यों न हों।
विदेश मंत्रालय ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत का वीज़ा सिस्टम पारदर्शी है और हर विदेशी नागरिक को आगमन से पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके वीज़ा का प्रकार और उद्देश्य मेल खाते हों। यदि कोई व्यक्ति नियमों का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी।
यह घटना भारत आने वाले विदेशी शिक्षाविदों के लिए एक अहम संदेश के रूप में देखी जा रही है कि वीज़ा नियमों की अनदेखी किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी, चाहे व्यक्ति की पहचान कितनी भी प्रतिष्ठित क्यों न हो।



