
चीन की विक्ट्री-डे परेड इस बार वैश्विक राजनीति का बड़ा केंद्र बनने जा रही है। बीजिंग में आयोजित होने वाली इस परेड में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग उन शामिल होंगे। इसके अलावा 26 विदेशी नेताओं की मौजूदगी इस आयोजन को और खास बनाएगी। विक्ट्री-डे परेड चीन के लिए न केवल ऐतिहासिक महत्व रखती है बल्कि यह उसकी सामरिक शक्ति और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव का भी प्रतीक मानी जाती है।
रूस और उत्तर कोरिया के शीर्ष नेताओं की उपस्थिति इस बात का संकेत है कि वैश्विक स्तर पर चीन, रूस और उत्तर कोरिया की नजदीकी और मजबूत हो रही है। ऐसे समय में जब पश्चिमी देशों और खासकर अमेरिका के साथ रूस और चीन के संबंध तनावपूर्ण हैं, यह परेड इन देशों के बीच गठबंधन को और गहरा करने का मंच साबित हो सकती है। पुतिन और किम जोंग उन की भागीदारी से यह संदेश भी जाएगा कि वे चीन के साथ खड़े हैं और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं।
चीन इस परेड के माध्यम से अपनी सैन्य क्षमता, तकनीकी प्रगति और रणनीतिक ताकत का प्रदर्शन करेगा। ड्रोन, मिसाइल, अत्याधुनिक टैंक और लड़ाकू विमानों की झलक इस आयोजन में देखने को मिलेगी। चीन की कोशिश होगी कि दुनिया को यह दिखाया जाए कि उसकी सेना न केवल एशिया बल्कि पूरी दुनिया में मजबूत और प्रभावशाली है। इसके साथ ही चीन यह संदेश भी देगा कि वह अपने सहयोगी देशों को लेकर किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है।
विक्ट्री-डे परेड का ऐतिहासिक महत्व भी है। यह आयोजन द्वितीय विश्व युद्ध में विजय की याद में किया जाता है। चीन इस दिन को जापानी आक्रमण के खिलाफ अपनी जीत और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में मनाता है। इस बार विदेशी नेताओं की बड़ी संख्या में मौजूदगी इस आयोजन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक प्रासंगिक बना रही है।
भारत सहित कई देशों की नज़र इस परेड पर टिकी है। एक ओर जहां पश्चिमी देश इस आयोजन को चीन-रूस-उत्तर कोरिया की रणनीतिक साझेदारी के तौर पर देखेंगे, वहीं दूसरी ओर एशियाई देश इसे शक्ति संतुलन की दिशा में अहम कदम मानेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि इस परेड के जरिए चीन अपनी कूटनीतिक ताकत और सैन्य शक्ति दोनों का संयुक्त प्रदर्शन करने जा रहा है।
चीन की विक्ट्री-डे परेड केवल एक सैन्य प्रदर्शन नहीं बल्कि एक कूटनीतिक संदेश भी है। पुतिन और किम जोंग उन की मौजूदगी इसे और भी महत्वपूर्ण बना देती है। यह आयोजन दुनिया को यह स्पष्ट संकेत देगा कि आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति में एशियाई धुरी और अधिक मजबूत होगी और चीन उसमें निर्णायक भूमिका निभाएगा।



