अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर भारतीय वैज्ञानिक शुभांशु शुक्ला की अगुवाई में एक खास रिसर्च टीम काम कर रही है। इस टीम का मकसद है – स्पेस में अल्ट्रासाउंड तकनीक का प्रयोग और मानव मस्तिष्क की कार्यप्रणाली पर गहराई से अध्ययन। अंतरिक्ष में ज़ीरो ग्रैविटी की स्थिति में शरीर और दिमाग कैसे प्रतिक्रिया करता है, यह जानना बेहद जरूरी है, खासकर भविष्य के लंबे अंतरिक्ष मिशनों के लिए। शुभांशु की टीम ऐसे उपकरण और तकनीक विकसित कर रही है जो बिना भारी मशीनों के, अल्ट्रासाउंड जैसे टेस्ट संभव बना सके। यह रिसर्च ना केवल स्पेस मेडिकल साइंस में क्रांति ला सकती है, बल्कि पृथ्वी पर रिमोट इलाकों में हेल्थकेयर पहुंचाने के तरीकों को भी बदल सकती है।
शुभांशु शुक्ला की टीम अंतरिक्ष में चिकित्सा विज्ञान और न्यूरोलॉजी से जुड़े ऐसे प्रयोग कर रही है जो आने वाले दशकों में स्पेस मिशनों की दिशा बदल सकते हैं। अल्ट्रासाउंड जैसी सामान्य तकनीक को स्पेस में बिना ग्रेविटी के काम करने लायक बनाना, मेडिकल साइंस में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। यह ना सिर्फ अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, बल्कि भविष्य में मंगल या चंद्रमा मिशनों के दौरान मेडिकल इमरजेंसी को हैंडल करने में भी मदद करेगा।
स्पेस में लंबे समय तक रहने वाले एस्ट्रोनॉट्स के दिमाग पर क्या असर होता है, इसे लेकर अभी तक सीमित डेटा था। शुभांशु की टीम खास सेंसर और न्यूरोलॉजिकल मापन तकनीकों का उपयोग कर रही है ताकि यह समझा जा सके कि ज़ीरो ग्रैविटी में मस्तिष्क की गतिविधियां, सोचने की क्षमता, निर्णय लेने की प्रक्रिया और भावनात्मक व्यवहार किस तरह प्रभावित होते हैं।
इस रिसर्च के लिए टीम ने खास तरह के पोर्टेबल और वायरलेस अल्ट्रासाउंड डिवाइसेज़ का विकास किया है, जो अंतरिक्ष में बिना ग्रेविटी की मदद के भी शरीर के अंदरूनी अंगों की तस्वीरें ले सकते हैं। ये डिवाइस ना केवल सटीक हैं, बल्कि आसान भी हैं – जिन्हें कोई भी एस्ट्रोनॉट सीमित ट्रेनिंग के बाद चला सकता है।
शुभांशु शुक्ला जैसे वैज्ञानिकों की मौजूदगी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की वैज्ञानिक पहचान को और मजबूत कर रही है। जिस रिसर्च टीम का नेतृत्व वे कर रहे हैं, वह केवल अमेरिका के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे मानव जाति के लिए अहम है। भारतीय मूल के वैज्ञानिक का इस तरह की हाई-प्रोफाइल रिसर्च में शामिल होना, युवाओं के लिए प्रेरणा है।



