थाईलैंड और कंबोडिया के बीच सीमा पर तनाव ने एक बार फिर मानवीय संकट की स्थिति पैदा कर दी है। चौथे दिन भी दोनों देशों के बीच झड़पें जारी हैं, जिनमें अब तक दर्जनों लोग घायल हो चुके हैं और हजारों की संख्या में स्थानीय निवासी अपने गांव-घरों को छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन कर चुके हैं। यह विवाद मुख्य रूप से दोनों देशों के बीच एक ऐतिहासिक मंदिर (प्रीह विहार मंदिर) और उससे सटे भू-भाग को लेकर है, जिसे लेकर पिछले कुछ वर्षों से टकराव की स्थिति बनी हुई थी। लेकिन इस बार हालात और ज्यादा गंभीर हो गए हैं क्योंकि दोनों सेनाओं ने मोर्चा संभाल लिया है और रॉकेट लॉन्चर, आर्टिलरी और छोटे हथियारों से गोलाबारी की जा रही है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र सीमा से सटे ग्रामीण इलाके हैं, जहां बमबारी और गोलीबारी के कारण भारी तबाही हुई है। मकान ढह गए हैं, स्कूल और अस्पताल बंद कर दिए गए हैं, और लोग छोटी-छोटी झुग्गियों में या टेंटों में शरण ले रहे हैं। कुछ लोगों ने जंगलों की ओर रुख किया है, जबकि कई लोग मंदिरों और राहत शिविरों में दिन-रात गुजार रहे हैं। पलायन कर रहे एक व्यक्ति ने बताया, “हम पूरी रात नहीं सो पाए। गोलियों की आवाज़ें लगातार आती रहीं। बच्चों को लेकर खेतों में छिपे रहे। अब नहीं पता हमारा घर बचा भी है या नहीं।”
संघर्ष का असर सिर्फ सीमा क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका राजनैतिक और कूटनीतिक प्रभाव भी दोनों देशों की सरकारों पर स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है। थाईलैंड की सेना ने कहा है कि वह ‘आत्मरक्षा’ में जवाब दे रही है, जबकि कंबोडिया का दावा है कि थाई सेना ने पहले गोलीबारी शुरू की थी। संयुक्त राष्ट्र और ASEAN जैसे क्षेत्रीय संगठनों ने दोनों देशों से संयम बरतने और वार्ता के ज़रिए समाधान निकालने की अपील की है। लेकिन जमीनी हालात इतने तनावपूर्ण हैं कि फिलहाल शांति की कोई स्पष्ट उम्मीद नजर नहीं आ रही।
इस संघर्ष में न केवल सैनिक हताहत हुए हैं, बल्कि कई निर्दोष नागरिक भी घायल हुए हैं। कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा जा रहा है कि संघर्ष के दौरान एक प्राथमिक स्कूल पर हमला हुआ, जिसमें तीन बच्चों को चोटें आईं। यह घटना खासकर तब और भी चिंताजनक बन जाती है जब स्थानीय प्रशासन राहत पहुंचाने में असमर्थ दिख रहा है। सीमा से सटे इलाकों में खाना, दवाइयां और साफ पानी तक की भारी कमी है। कुछ जगहों पर तो लोग पेड़ों की पत्तियां और जंगल के फल खाकर गुजारा कर रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया भी इस संघर्ष को गहराई से कवर कर रही है और कई चैनलों ने लाइव रिपोर्टिंग में यह दिखाया कि कैसे ग्रामीण लोग अपने सिर पर सामान लेकर, बच्चों को गोद में उठाकर मीलों तक पैदल चल रहे हैं ताकि किसी सुरक्षित जगह पहुंच सकें। स्थानीय प्रशासन ने अस्थायी राहत कैंपों की व्यवस्था की है, लेकिन संसाधनों की भारी कमी के चलते यह शिविर जरूरत से बहुत कम साबित हो रहे हैं। कुछ शिविरों में तो एक-एक टेंट में 10 से 15 लोग ठूंसे हुए हैं।
क स्थानीय NGO कार्यकर्ता ने बताया, “हमारे पास न पर्याप्त दवाइयां हैं, न खाने का सामान। लोग डरे हुए हैं और बीमारियां फैलने लगी हैं। अगर जल्द ही हालात नहीं सुधरे तो बड़ी मानवीय त्रासदी हो सकती है।”
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह विवाद केवल ज़मीन के एक टुकड़े का नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता, इतिहास और रणनीतिक हितों का भी मामला है। प्रीह विहार मंदिर, जो युनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, दोनों देशों के लिए गर्व का प्रतीक है और यही वजह है कि इसे लेकर टकराव अक्सर भड़क उठता है। इस मंदिर को लेकर 1962 में भी अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में विवाद गया था, जहां यह फैसला आया था कि मंदिर कंबोडिया के अधिकार क्षेत्र में है, लेकिन थाईलैंड ने उस फैसले को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया।
अब जबकि यह संघर्ष फिर से उभर चुका है, तो एक बार फिर यह बहस शुरू हो गई है कि सीमाओं को लेकर ठोस और परस्पर सहमति आधारित हल निकाला जाना चाहिए। कंबोडिया के प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र से हस्तक्षेप की मांग की है, वहीं थाईलैंड की सरकार ने कहा है कि वह किसी भी विदेशी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेगी और वह बातचीत के जरिए समाधान निकालने को तैयार है।



