
भारत सरकार और राज्य सरकारें सदैव जनजातीय समुदायों के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए संकल्पबद्ध रही हैं। इसी क्रम में जनजाति कल्याण विभाग को नोडल विभाग के रूप में नियुक्त किया गया है, जो अब विभिन्न विभागों के साथ समन्वय स्थापित करते हुए योजनाओं के प्रभावी कार्यान्वयन की दिशा में अग्रसर है। इस कदम का उद्देश्य न केवल आदिवासी समाज को मुख्यधारा से जोड़ना है, बल्कि उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं से सशक्त बनाना भी है।
जनजाति कल्याण विभाग द्वारा शिक्षा विभाग के साथ मिलकर विशेष आवासीय विद्यालयों और छात्रवृत्ति योजनाओं का संचालन किया जा रहा है, जिससे आदिवासी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त हो रही है। वहीं स्वास्थ्य विभाग के सहयोग से दूरस्थ क्षेत्रों में मोबाइल हेल्थ यूनिट्स, पोषण योजनाएँ और मातृ-शिशु स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। इससे आदिवासी अंचलों में स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार संभव हो रहा है।
रोजगार और आजीविका के क्षेत्र में विभाग श्रम एवं कौशल विकास मंत्रालय के साथ समन्वय कर युवाओं को प्रशिक्षण एवं स्वरोजगार के अवसर प्रदान कर रहा है। साथ ही वन विभाग और ग्रामीण विकास विभाग के सहयोग से जल, जंगल और जमीन से जुड़ी योजनाओं को अधिक सशक्त बनाया जा रहा है। इससे न केवल प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण हो रहा है बल्कि आदिवासी परिवारों की आय में भी वृद्धि हो रही है।
महिला सशक्तिकरण के लिए स्वयं सहायता समूहों का गठन, हस्तशिल्प और लघु उद्योगों को बढ़ावा देने जैसे प्रयास किए जा रहे हैं। विभागीय समन्वय से आदिवासी संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित करते हुए उन्हें आत्मनिर्भर बनाने पर भी बल दिया जा रहा है।
कुल मिलाकर, जनजाति कल्याण विभाग का नोडल विभाग बनना, योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता, गति और प्रभावशीलता लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। विभिन्न विभागों के बीच सामंजस्य और सहयोग से आदिवासी समाज के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त हो रहा है। यह पहल न केवल सामाजिक न्याय की दिशा में अहम है बल्कि “सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास” के संकल्प को भी साकार करती है।



