
दुनिया की दिग्गज टेक कंपनियां जैसे गूगल, अमेज़न और एप्पल लगातार अलग-अलग देशों में अपने कारोबार का विस्तार कर रही हैं। लेकिन हाल ही में कई देशों ने इन कंपनियों पर डिजिटल टैक्स लगाने का फैसला किया है। यह टैक्स उन कंपनियों पर लागू होगा जो डिजिटल सेवाओं और ऑनलाइन बिजनेस से अरबों डॉलर का मुनाफा कमा रही हैं। सवाल यह है कि इस फैसले का असर सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा या नहीं? क्या iPhone और दूसरी डिजिटल सेवाएं महंगी हो जाएंगी?
दरअसल, यूरोप और एशिया के कई देशों ने यह दलील दी है कि गूगल-अमेज़न जैसी अमेरिकी कंपनियां उनके देशों में अरबों का बिजनेस करती हैं लेकिन टैक्स बहुत कम भरती हैं। ऐसे में डिजिटल टैक्स से स्थानीय सरकारों को अतिरिक्त राजस्व मिलेगा। लेकिन इस कदम से अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भड़क गए। उन्होंने इसे अमेरिकी कंपनियों के खिलाफ साजिश बताया और चेतावनी दी कि अगर देशों ने डिजिटल टैक्स से पीछे कदम नहीं हटाया तो अमेरिका भी सख्त कदम उठाएगा।
ट्रंप का कहना था कि अगर गूगल, अमेज़न या एप्पल पर ज्यादा टैक्स लगाया जाएगा, तो इसका सीधा असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था और इन कंपनियों के प्रोडक्ट्स की कीमतों पर पड़ेगा। ऐसे में iPhone जैसे प्रोडक्ट्स महंगे हो सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियां टैक्स का बोझ उपभोक्ताओं पर डाल देंगी, जिससे इलेक्ट्रॉनिक्स और डिजिटल सेवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी तय है।
भारत सहित कई देशों में भी इस मुद्दे पर चर्चा तेज है। भारत ने पहले से ही डिजिटल सेवाओं पर ‘इक्वलाइजेशन लेवी’ लगाई हुई है, जिससे गूगल और फेसबुक जैसी कंपनियां प्रभावित होती हैं। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह विवाद अब एक बड़ा व्यापारिक टकराव का रूप लेता जा रहा है।
अगर स्थिति ज्यादा बिगड़ती है तो आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय बाजार में टेक प्रोडक्ट्स की कीमतें बढ़ सकती हैं। इससे आम उपभोक्ता की जेब पर बोझ बढ़ेगा। दूसरी ओर, कई देश यह तर्क भी दे रहे हैं कि टैक्स से मिले पैसों को स्थानीय डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने में खर्च किया जाएगा, जिससे रोजगार और तकनीकी विकास को बढ़ावा मिलेगा।
कुल मिलाकर, डिजिटल टैक्स पर जारी यह खींचतान न केवल सरकारों और कंपनियों के बीच तनाव को बढ़ा रही है बल्कि यह उपभोक्ताओं के लिए भी नई चुनौतियां पैदा कर सकती है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या iPhone और अन्य डिजिटल प्रोडक्ट्स सचमुच महंगे होते हैं या बड़ी कंपनियां टैक्स के बोझ को खुद वहन करने का रास्ता निकालती हैं।



