यूपी में ग्रामीण पेयजल की होगी डीप टेस्टिंग, PFAS की भी जांच

ग्रामीण इलाकों में लोगों को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण पेयजल उपलब्ध कराने के लिए उत्तर प्रदेश में जल जांच व्यवस्था को मजबूत किया जा रहा है। नई अत्याधुनिक लैब के जरिए पानी की सामान्य गुणवत्ता के साथ उन सूक्ष्म प्रदूषकों की भी जांच संभव होगी, जिनकी पहचान पारंपरिक जांच में आसानी से नहीं हो पाती।
इस जांच में माइक्रोप्लास्टिक्स के साथ PFAS यानी पर- और पॉलीफ्लुओरोएल्काइल पदार्थों की पहचान पर विशेष जोर रहेगा। PFAS को ‘फॉरएवर केमिकल्स’ कहा जाता है, क्योंकि ये पर्यावरण में बेहद लंबे समय तक बने रह सकते हैं।
नई व्यवस्था से ग्रामीण पेयजल स्रोतों की गुणवत्ता का ज्यादा गहराई से आकलन किया जा सकेगा। यदि किसी स्रोत में निर्धारित मानकों से अधिक प्रदूषक पाए जाते हैं, तो संबंधित विभाग समय रहते सुधारात्मक कदम उठा सकेगा।
उत्तर प्रदेश में पहले से ही गांवों में पानी के नमूनों की जांच के लिए महिलाओं को प्रशिक्षित किया जा रहा है। फील्ड टेस्ट किट के जरिए कई प्राथमिक मानकों की जांच गांव स्तर पर की जाती है, जबकि अत्याधुनिक लैब में अधिक जटिल और सूक्ष्म प्रदूषकों की जांच की जा सकेगी।
PFAS की पहचान की नई तकनीक को लेकर लखनऊ स्थित भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान (IITR) में भी काम हुआ है। विकसित तकनीक से बेहद कम मात्रा में मौजूद कई PFAS रसायनों का तेजी से पता लगाने की क्षमता बताई गई है।
ग्रामीण पेयजल की इस ‘डीप टेस्टिंग’ व्यवस्था का उद्देश्य केवल पानी की तत्काल शुद्धता जांचना नहीं, बल्कि भविष्य में सामने आने वाले नए प्रदूषकों की निगरानी को भी मजबूत करना है। इससे सुरक्षित पेयजल आपूर्ति और जल गुणवत्ता प्रबंधन को नई तकनीकी मजबूती मिलने की उम्मीद है।



